अथ श्री चमचापुराण

Hierarchy-cartoon-e1421392319757एक चमचा होता है , उसके चार चमचे

होते हैं, फिर? फिर क्या उसके भी चार चमचे होते हैं। जैसे पीढ़ी दर पीढ़ी बच्चे होते हैं, वैसे ही चमचे होते हैं। हर पीढ़ी का चमचा निचली पीढ़ी के चमचो से ज्यादा ताकतवर होता है । चमचे उन लताओं की तरह होते हैं जो बिना किसी पेड़ के खड़े नहीं हो सकते। और कुछ वो होते हैं जो किसी के चमचे नहीँ होते यानि ऐसे पौधे जो अपने आप पेड़ बन जाने की काबिलियत रखते हैं।
तो कहाँ थे हम? हाँ पहली पीढ़ी की चमचे अपने आसपास के पौधों को स्वयं बढ़ते देख हीनभावना से भर जाते हैं। फिर वो अपने चमचापिता को कहते हैं वो देखो कैसे बढ़ता जा रहा है वो पौधा! कहीं पेड़ ही न बन जाये । चमचा पिता डरता है, कहीं ये मेरे समकक्ष खड़ा हो गया तो?
फिर वो दादा चमचा से कहता है इस पौधे को कुचल दो, दादा चमचा अपने बेटे चमचे को प्रसन्न करने के लिए उस पौधे को कुचल देता है। फिर चमचों की तीनो पुश्तें जश्न मनाती है और कुचला हुआ पौधा देखता रहता है। वो दुबारा बढ़ता है और अबकी बार उसकी जड़ें और मजबूत हो गयी होती हैं। इस तरह चमचागिरी चलती रहती है और पौधे पेड़ बनते रहते हैं।
हमारे देश के हर तंत्र में इस प्रथा का बोलबाला है और हमारी सात पुश्तें भी इसे ख़त्म नहीं कर सकती है क्योंकि ऐसी लताओं की कमी नहीं है जो स्वयं ऊपर नहीँ चढ़ सकती। लेकिन हे लताओं तुम्हारी क्या पहचान? किस के काम आओगी तुम? पेड़ तो छाया देते हैं कमसे कम, तुम तो अपने फल का बोझ भी नहीं उठा सकोगी।ये प्रथा हर तंत्र को खोखला कर रही है,प्रतिभाओं को कुचल रही है।

उठो जागो, अपनी पहचान बनाओ, लता नहीं पेड़ बन कर दिखाओ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *