आखिर किस ओर जा रहे हैं हम?

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मानवता को शर्मशार करती हुई यह तस्वीर रांची के प्रसिद्ध अस्पताल रिम्स की है। एक मानसिक रूप से पीड़ित महिला को जमीन पर ही खाना परोस दिया गया और वो खा भी रही है।पूछने पर बताया गया कि कई दिनों से ऐसा हो रहा है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि किसने ऐसा किया,कौन लोग इसके लिए जिम्मेदार है।निश्चित रूप से तस्वीर सामने आने के बाद जाँच गठित होगी। एक दो निलंबन भी हो सकता है।क्या इतने मात्र से यह बात ख़त्म हो जाती है? नहीं,यह महज एक तस्वीर नहीं एक आईना भी है जो हमारे मानसिकता,हमारे सोंच को दर्शा रहा है कि हम कितने असंवेदनशील हो गए हैं इस दौड़ती भागती ज़िन्दगी में। हम कब इतने स्वार्थी हो गए पता ही नहीं चला।हमारे अंदर की करुणा,दया,संवेदना हर बढ़ते दिन के साथ क्यूँ ख़त्म होती जा रही है।हम मनुष्य से पशुता की ओर क्यूँ बढ़ रहे है।आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं हम इन सब से?? ये हम सब के सोंच से परे है।आज हमारे पास इतना वक्त नहीं की हम किसी का हाल चाल पूछ सके।सुखःदुख में शरीक होने की तो बात ही छोड़ दीजिए।
किसी ने तो देखा होगा उस महिला को जो इतने दिनों से फर्श पर परोसा खाना खा रही है।छोड़ दीजिए उनके जिम्मेदारियों की बात जो इसके लिए गुनाहगार है। एक समान मानवीय का क्या कर्त्तव्य है।क्या किसी की भी व्यक्ति के दिल को ये झकझोरा नहीं जिन्होंने उसे खाते हुए देखा। एक “50 रूपये की थाली” किसी को नहीं नहीं महसूस हुआ की उसे लाकर दे दें। अगर नहीं हुआ तो यही दर्शता है कि हम भले कितनी भी भौतिक तरक़्क़ी कर ले लेकिन नैतिकता जिसके लिए विश्व हमें जनता था,हम उसके निचले पायदान पर पहुँच चुके हैं।
धन्यवाद्

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