आत्महत्या…और एक अधूरा सपना।

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पापा मुझे माफ़ कर दो ! एक सपने की मौत “पापा मुझे माफ़ कर दो !” यही कहते कहते एक पिता का पुत्र इस संसार को अलविदा कह गया. एक माँ का कलेजा छलनी हो गया. कोटा में पल रहे एक सपने की मौत हो गयी. कौन सा सपना? कैसा सपना? अपने बेटे को डॉक्टर बनते देखने का सपना. वो सपना जो आज एक माँ बाप के लिए उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल बन गया है. उनका लाडला बेटा उनके सपने की बलि चढ़ गया है. सुना तो होगा न आपने ? इस साल कोटा में होने वाली १३ आत्महत्याओं की कड़ी में एक और आत्महत्या शामिल हो गयी है. बिहार के वैशाली जिले के राघोपुर गाँव का बेटाअमन कुमार गुप्ता अब इस दुनिया में नहीं है.
बेटा मरने से पहले एक विडियो छोड़ गया है जिसमे उसने अपने पिता से उनकी उमीदों को तोड़ने के लिए माफ़ी मांगी है.उसके पिता उसे मेडिकल की परीक्षा में असफल होने के लिए तो शायद माफ़ कर भी दें ,पर क्या उसे खुद की जान लेने के लिए माफ़ कर पाएँगे? या फिर खुद को एक सपना देखने के लिए माफ़ कर पाएंगे? शायद नहीं. आखिर इन १४ मौतों का कौन जिम्मेवार है? हम सभी जिम्मेवार हैं जो ऐसा माहौल पैदा करते हैं जिसमे इंसान की पूरी ज़िन्दगी औरों से प्रतिस्पर्धा में ही बीत जाती है. हो हर कोई कर रहा है वही हमे भी करना है. आखिर भेड़चाल का हिस्सा जो बनना है. हम क्यूँ नही समझ पाते अपने बच्चों को? उनके सपनो को? क्यों २० साल पहले अधूरे रह गये खुद के सपने को अपने मासूम बच्चे के कंधे पर लाद देतेहैं .और वो बच्चे उन सपनो को ढोते ढोते अपने खुद के सपनो को भूलजाते हैं. और एकदि न जब उन्हें लगता है की वो आपके सपने पूरे नही कर पाए तो वोमा न लेते हैं कीज़ि न्दगी ख़त्म. ऐसे में उन्हें कोई सपना नहीं सूझता, बस एक अँधेरा रास्ता सूझताहै  जो उन्हें मौत के गहरे कुएं में धकेल देता है.अधिकतर माता पिता अपने बच्चों पर डाक्टर इंजिनियर बनने के लिए सिर्फ इसलिए दबाव डालते हैं ताकि लोगों को दिखा सकें की हमने अपने बच्चे को लायक बनाया है. अगर आपका बच्चा आगे चल कर गायक या लेखक बन गया तो आपकी शान कम रह जाएगी क्या?

हम सभी को ये समझना होगा की वक्त के साथ साथ सोच भी बदलती है. जैसा आप सोचते हैं जरुरी नही की आपके बच्चे भी वही सोचते हों. जिस काम में दिल ही न लगे उसमे कोई कैसे अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकता है. शायद यहीं कमी रह जाती हो. मैं ये नहीं कहती की बच्चों को डॉक्टर इंजिनियर बनने के लिए कहना गलत है पर आपको ऐसा करने से पहले अपने बच्चे को समझना होगा. क्या
उसकी क्षमता इतनी है की वो दिन के १६-१६ घंटे पढ़ पाए? कहीं उसकी असफलता की वजह कोई मानसिक समस्या तो नहीं है? वो घर से दूर खुद को संतुलित करने में सक्षम है? वगैरह वगैरह .उन्हें ये बताना जरूरी है की इसके अलावा भी करियर के विकल्प हैं
जिनके बारे में सोचा जा सकता है ताकि वो कोई बड़ा कदम न उठाएं. सपने देखिये पर अकेले नही अपने बच्चों के साथ !

 

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