आप सुन रहें है विविध भारती (कहानी) – आनंद

आप सुन रहें है विविध भारती(कहानी)

प्रभुनाथ बाबू गांव के जमींदार है, घर में सुख-सुविधा की रत्तीभर कमीं नहीं है। दू मंजिला कोठी, एगो चार चक्का, गांव-जवार में जब न्योता हकारी में बुलावा होता है तो ड्राईवर ललनमा के बगल में उजरका धोती कुरता पहने एकदम नेता टाईप फीलिंग लेते हुए बोलेरो में आगे बैठते है और तब निकलते है, पान रोज खाते है, पान के ललिहट से कुरता का कॉलर चमचमाता रहता है, कल घर की सफाई करवा रहे थे, फिलिप्स वाला पुरनका फूटलका रेडियो दिखा है, रेडियो देखते ही भाव विभोर हो गए, पुरानी यादों में खो गए,

हाय रे समय के खेला। क्या समय था, जब पहिला बेर चुन्नुआ के माई के साथे पटना गए थे तो जगेसर बाबू, इंजीनियर साहेब के यहां रेडियो देखे थे, तो एकदमे अकबका गए कि ई कवन सा यंत्र है भाई, ऐतने बर के मशीनिया में आदमी कईसे घूस गया है और बोलता भी है महराज, गांव में लौट के आए तो अपने संगी-साथी को बताए तो जोखन बाबा तो विश्वासे नहीं किए, बोले कि अरे ई प्रभुनथबा झूठ के फैक्टरी है, खाली गप मारता है, ऐतने बर के मशीनिया में आदमी कैसे घूस जाएगा, पास में बैठे सभी संगी साथियों ने जोरदाऱ ठहाका लगाया था, प्रभुनाथ बाबू का इगो हर्ट हुआ।

प्रभुनाथ बाबू ने प्लान बनाया कि कैसे भी रेडियो लाकर दिखाएंगे, रात भर नींद न आया, भोरे भोरे चुन्नुआ के माई के बोले की 300 रूपिया लेकर निकले, रास्ते के लिए ठेकुआ, खजूरी बनवाकर रख लिये है, पटना पहुंचते ही जगेसर बाबू से रेडियो के संबंध में बात किए, अगले दिन फिलिप्स कंपनी का रेडियो खरीदा गया है, कल सुबह किरण फूटे से पहिले ही पटना छोड़कर गांव के लिए निकल चुके है, गांव में पहुंचते ही पूरे गांव में जंगल के आग की तरह बात फैल गई, फेकूआ तो पूरे गांव घूमकर सब को सूचना दे दिया कि अरे चलिए देख लीजिए, प्रभुनाथ बाबू गजब के मशीन लाए है, तनिका बर के मशीनिया है, लेकिन पता न अंदर कैसे आदमी घूसा है, बड़ी मीठ-मीठ बोलता है, मुखिया जी को पता चला भागकर धोती सरियाते हुए आए, सरपंच साहेब भी पगड़ी संभालते हुए आए थे, पूरे गांव से मजमा लग गया रेडियो दर्शन की खातिर, प्रभुनाथ बाबू 20 बीघा जमीन खरीदे, हवेली बनाए, तब भी इतनी इज्जत और शोहरत न मिल सकी थी जो गांव में पहली बार रेडियो लाने पर मिली, पत्नी की इज्जत भी मुहल्ले में बढ़ गई, हर घर से उचित रिस्पोंस मिल रहा था, जो सैदपूर वाली चंदेसरा बहू, पड़ोसन पहले कटाह निगाहों से देखती थी, आज थाली सजाए स्वागत के लिए तैयार थी. सच में रेडियो तो प्रभुनाथ बाबू एवं पूरे परिवार के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया, प्रभुनाथ बाबू तो कांखी में रेडियो दाब के ही पेशाब करने जाते थे, जब गांव में रेडियो बजाते हुए रोड से गुजरते तो जटेसर बाबू की पत्नी नएकी बहुरिया को बुला लाती थी कि ऐ बहुरिया ई देखी कवन सा यंत्र है. बहुरिया खिड़की से अंचरा उठा के ताकती रहती थी, पछियारी टोला के जमींदार सब मुंह धुंआ कर लेता था, कई तो जर के झरिया के कोयला खान नियन हो जाता था, जब रेडियो हाथ में लिए घूमते तो गांव के छोटे-छोटे लौंडे भी पीछे दौड़ने लगते थे, प्रभुनाथ बाबू को भी एकदमे राजत्व वाला फीलिंग आ रहा था, निमनका ललका जाजिम का खोल रेडियो में लगवा दिए।

मुर्गा बांग दे न दे, सुबह सुबह जोखन बाबा हाथ में लोटा और नीम का दतुअन लिए पहुंच जाते थे, रामरतन मुखिया जी भी पहुंचते और बोलते कहां गए प्रभुनाथ बाबू बीबीसी लगाईए, न्यूज आ रहा होगा. जबतक बीबीसी का न्यूज नहीं सुन लेते थे तब तक पेशाब-पैखाना नहीं उतरता था, बीबीसी का न्यूज सुन के ही सब के मिजाज हरियर होता था, न्यूज सुनकर बिहार से झारखंड का विभाजन चर्चा से लेकर, लालू यादव के चारा घोटाला, पाकिस्तान के सीजफायर वायोलेशन और कारगिल वार तक सब का एनालिसिस सब अपने अपने तरीके से करते थे, मुखियाजी बोलते की ई लालू जादो एकदमे देश बेच देगा जोखन बाबू होशियार रहिए अगली बार वोट हम न देंगे ई घोटाला बाज को, चारा तक नहीं छोड़ा,  तभी जोखन बाबा बोलते की अरे मुखिया जी, घोटाला तो चलते रहता है भाई, सुने है बहुते बड़का परिवार है उसका, 15-20 आदमिया है ओकरा घरे, तो खिलाने पिलाने के लिए घोटाला जरूरी न है, भाई कहां से खिलाएगा, अरे उसको छोड़िए मेन दुशमन तो पाकिस्तान है महराज, उसको देखिए न डेली बिना पूछे गोलिया चला देता है, आजो न्यूज वाला छौरा बोला है कि 3 जवान शहीद, केकरो न केकरो बेटा ही न मरा होगा. कउनो मजबूत नेता के जरूरत है देश को, जटेसर बाबू तो सुबह-सुबह जबतक गुलशन कुमार वाला भक्ति गाना से लेकर विविध भारती पर पौने आठ बजे हवा महल कार्यक्रम जब तक नहीं सुनते, तब तक तो वो वहां से जाते ही नहीं थे। समय बीतता गया, धीरे-धीरे गांव में रेडियो का क्रेज भी बढ़ता गया, रेडियो की संख्या भी बढ़ती गयी लेकिन प्रभुनाथ बाबू के दरवाजे पर फिर भी रेडियो सुनने के लिए भीड़ उमड़ती, बैटरी नहीं होता तो तीन सेला टार्च में से झटपट निकालकर निप्पो की बैटरी लगा देते थे।

सामाजिक समरसता का वाहक था रेडियो, दखिनवारी टोले के दलित से लेकर, उतरवारी टोले के मुस्लिम भाई तक सब प्रभुनाथ बाबू के दुहारी पर रेडियो पर मैच सुनने आते थे, खैनी बनता था, सब के हाथ में बंटता जाता था, सारे जातिवादी-मनुवादी भांड़ में जाए, पूरा गाँव धर्मनिरपेक्ष था, सब की खातिरदारी प्रभुनाथ बाबू द्वारा किया जाता था, जईसे पता होता की अरे आज भारत पाकिस्तान का मैच है, पूरे गांव में फेकूआ बैलगाड़ी लेकर पूरा गांव घूमकर सूचना दे आता था, प्रभुनाथ बाबू के ईहां रेडियो बजेगा, मैच है आज, 2.30 बजे दिन में रेडियो सबसे उंचे स्थान पर रखा जाता था, जहां से प्रभुनाथ बाबू रेडियो के चैनल को अईंठ के पटना वाले मेगाहर्टज तक पहुंचाते थे, पटना चैनल का दिक्कत ये था कि क्लियर पकड़ता नहीं था, झरझराते रहता था, वहीं तनिके बगल में नेपाल चैनल के हर्टज पर झकझक फ्रेस आवाज देता था, फिर भी मैच के लिए पटना लगाकर सुनते थे, ये वो समय होता था जब अंगूठा छाप फेकुआ से लेकर 8वां फेल रामरतन मुखियाजी भी अंग्रेजी में प्रकाश वाकंकर और विनित गर्ग की कमेंट्री सुन के एनालिसस करते थे, मुखिया जी बोलते – ओह सचिनमा को टिक के खेलना चाहिए था न, केतना बढ़िया खेल रहा था, हमेशा हुलबुलाएल रहता है महराज, धत हम जा रहे है न सुनेंगे। तभी जोखन बाबा बोल उठते थे – अरे मुखिया टेंसन न लो, कईसे भी इंडिया ही मैच जीतेगा  डीह वाले बाबा को 11 रूपया के बताशा चढाएंगे मैच को। जब टीम इंडिया मैच जीत जाती तो सब के चेहरे पर मुस्कान.

तिलक दहेज में रेडियों को वरीयता दिया जाने लगा। रामकृपाल बाबू की जब बड़की दुल्हिन घरे आयी और रेडियो न लायी तब सास ने रेडियो के लिए साथ-निभाना-साथिया सीरियल वाली कोकिला बेन के जैसे नाक-मुंह फूला के बईठ गई। बड़की बहुरिया गहना बेच के रेडियो खरीदके लायी तब जाके खुले हवा में सास ने सांस ली और बहुरिया के प्रति स्नेह रोम-रोम में संचार हुआ, संतोषबा तो अपन बाबूजी को कह दिया कि देख लीजिए बाबूजी जब तक सुनितिया के बाबूजी फिलिप्स कंपनी का रेडियो हमके खरीद कर न देंगे तब तक हम गौना करा कर न लाएंगे। सुनितिया जब अगली बार नईहर से आयी तो साथ में फिलिप्स कंपनी का रेडियो भी आया. संतोषबा तो खुशी से फुल के पुआ हो गया।

घरे घर रेडियो का गजब का महत्व था, संगितिया, सुनितिया टाईप बहुरिया बैंगन, भिंडी की सब्जी काट रही होती थी और उधर विविध भारती पर कुमार सानू का गाना – “कितना हसीन चेहरा कितनी प्यारी आंखे, कुदरत ने बनाया होगा फुरसत से तूझे मेरे यार” बजता रहता था, घऱ की बहुओं के अकेलापन का साथी था रेडियो, रमेश, सुरेश, संतोष टाईप केतना पतिदेव रोजगार के लिए बिहार छोड़कर दिल्ली, कलकत्ता, पंजाब होते थे, विरह की अग्नि में जलती हुई पत्नियों की एक मात्र सहेली थी विविध भारती। विविध भारती के विभिन्न कार्यक्रमों की समय सूची तक कंठस्थ याद होता था, संतोषबा तो अपनी पत्नी सुनितिया की फरमाईस नाम से गाना बजवाने के लिए विविध भारती को चिठ्ठी लिखा था, 8-10 ठो चिठ्ठी लिखा तब जाकर एक में नाम घोषणा हुआ कि सीतामढी, बिहार से संतोष जी ने अपनी प्यारी पत्नी सुनिता को गाना डेडिकेट किया है,  फिल्म दिलवाले, आवाज दिया है कुमार सानू और अल्का याज्ञनिक ने, गाने के बोल है,

 “जीता था जिसके लिए जिसके लिए मरता था एक ऐसी लड़की थी जिसे मैं प्यार करता था”

आईए सुनते है संतोष जी की पसंद का ये गाना। सुनिता स्वेटर बुन रही थी अपना नाम रेडियो पर सुनते ही उस दिन खुशी से पगला गई थी, इतनी खुश कि पूछिए मत।

समय बीता है, लोग सभी प्रगतिशील होते गए, नई-नई तकनीक का आगमन हुआ, रेडियो को धकिया के सादा टी.वी. आया, फिर रंगीन फिर आज LCD, एल.ई.डी टीवी ने घर-घर में अपनी पैठ बना ली है, हर घर में रेडियो आज भी है, लेकिन किसी कोने में कबाड़ी बना बैठा उपेक्षित बुजुर्ग आडवाणी जी की तरह, आज किसी संतोषबा को अपनी प्राणप्रिये को मनपसंद गाना सुनाने के लिए किसी विविध भारती को चिठ्ठी लिखने की जरूरत नहीं होती, मोबाईल खोलकर ऑडियो तो छोड़ो यूटूब से विडीयो भी दिखा सकता है, कौन पूछे रेडियो को, टाईम किसके पास है. लेकिन, आज भी गांव के प्रभुनाथ बाबू टाईप बुजुर्ग के दिन की शुरूआत बीबीसी न्यूज और गुलशन कुमार, अनुप जलोटा के भजन से होती है। पिछले तीन साल से मोदी चचा आए हैं, मन की बात कार्यक्रम हिट हुआ है, तो प्रसार भारती को तनिका होश आया है। परसो राजवर्धन राठौर जी लोकसभा में बता रहे थे कि ‘मन की बात’ कार्यक्रम से कुल 10 करोड़ का लाभ प्रसार भारती को हुआ है। “चलिए न मामा से अंधा मामा”

खैर, सब कुछ बदल गया है, एफ.एम चैनलों की बाढ़ आ गई है, कुकुर मुत्ते की तरह उग गए है, हर मोबाईल में रेडियो बैठा है, रेडियो मिर्ची, रेडियो धनिया, लहसून, फ्लाना, ढीमका।  आलोकनाथ टाईप RJ  बदलकर ढिंचैक पूजा टाईप हो गए है, सब बदल गया लेकिन एक चीज नहीं बदला तो वो है विविध भारती, पिछले 60 सालों से आज भी वहीं रंग, कभी फुरसत मिले तो मोबाईल पर ही सही, लगाईएगा, सीमा पर SLR ताने फौजी भाईयो के लिए वो जयमाला कार्यक्रम, महिलाओं के लिए सखी सहेली जैसे कार्यक्रम, अब भी अखिल भारतीय स्तर पर प्रसारित होता है, फुरसत के पल में सुनिएगा कभी, आज भी जब विविध भारती सुनता हूं न तो पता नहीं क्यूं अपनत्व का एहसास होता है।

– आनंद,

सीतामढ़ी, बिहार.

 

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