कन्हौली गांव का प्राचीन इतिहास….

गर्भ गृह

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अपने सीतामढ़ी जिले के नेपाल बॉर्डर से सटा कन्हौली गांव का इतिहास बहुत पुराना है। बात त्रेता युग की है तब यह गांव मिथिला राज्य की अधीन तराई क्षेत्र का हिस्सा हुआ करता था। राजा जनक यहाँ के शासक थे। इस गांव में एक गढ़ हुआ करता था जिसका अवशेष आज भी मौजूद है। ऐसी मान्यता है की गढ़ में एक बहुत बड़ा शीला हुआ करता था जहा दूर दूर से लोग आकर पूजा अर्चना करते थे और कोई खाली हाथ नहीं लौटता था। इसे मिथिला राज्य के पश्चिमी भाग का गढ़ संग्रह भी कहा जाता था।आज भी उस जगह ब्रह्मस्थान है और गांव के लोगों की असीम श्रद्धा वहां से जुड़ी हुई है। पहले यहाँ के लोग इस गांव को करहौली नाम से बुलाते थे बाद जिसे बदल कर कन्हौली कर दिया गया। वैसे तो पुरे मिथिला में तालाबों की कोई कमी नहीं थी लेकिन इस गांव में कहीं अधिक तालाब थे जो की आज भी आसपास के और गांव से ज्यादा है।गांव के मध्य में कई छोटे तालाब थे,तो चारों दिशाओं में सीमा पर चार बड़े बड़े तालाब थे। पश्चिम दिशा से स्थित एक तालाब था उसका नाम कानपोखर था,जो आज भी है। कहा जाता है की वहां एक ऋषि रहते थे जिनका नाम करपात्री जी महाराज था। उसी तालाब के किनारे उनकी कुटिया थी जहां वे साधना करते थे। उन्ही के नाम इस गांव का नाम करहौली रखा गया है। लोगों का मानना ऐसा भी है की जब मिथिला के राजा जनक जी की पुत्री सीता जी का विवाह अयोध्या नरेश दशरथ जी के बड़े पुत्र रामचंद्र जी से हुआ तो जनक जी मिथिला के कुछ हिस्से सीता जी को खोहिचा में दे दिया।ये हुई पुरानी बातें।

जब अंग्रेज भारत आये तब यह गांव परसौनी राजा के राज्य में आता था। उस समय वहाँ के राजा याकूब खान हुआ करते थे। बाद में बाबू लक्ष्मी प्रसाद ने इस क्षेत्र को याकूब खान से खरीद लिया।फिर आज़ादी के बाद से यह गांव मुजफ्फरपुर जिला के अंतर्गत आ गया। बाद में सीतामढ़ी जिला का निर्माण हुआ तो यह उसके हिस्से में पड़ा। कुछ ऐसी ही है सीतामढ़ी जिले की इस प्रमुख गांव की दास्तां। उम्मीद है आपको यह यह प्राचीन इतिहास अच्छी लगी होगी।


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