“कर्कशा”

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तुम क्या किसी से भी प्यार से बात नहीं कर सकती? वो चिढ़कर
बोला। वो एक पल को रुकी – वो क्या कर रही थी? आधे घंटे से उस
से लड़ रही थी क्योंकि वो पंद्रह मिनट देर से उसे लेने स्टेशन आया
था। उसने एक गहरी सांस ली और चुपचाप स्कूटर पर बैठ गयी। स्कूटर
पर बैठे बैठे वो अतीत की यादों में खो गयी। कैसे वो इतना बदली
की कर्कशा बन गयी। हर समय लोगों पर चिल्लाना, लड़ना उसकी
आदत में शामिल हो गया था। वक्त के थपेड़ो से लड़ते लड़ते वो
चट्टान सी बन गयी। और बनती भी क्यों ना, भावुक हो कर उसका
गुज़ारा कैसे संभव था? किसी पुरुष से हंस कर बात करेगी तो वो
गलत अर्थ निकालेगा, यही डर सताता था उसे। विवाह के केवल दो
वर्ष बाद ही पति की आकस्मिक मृत्यु और दुधमुँहे बच्चे और बीमार
ससुर की खातिर घर से निकलने से मजबूर हो गयी थी नियति।
‘नियति’ जाने क्या सोच कर उसका नाम रखा था उसके माता
पिता ने।
घर से निकलने से पूर्व उसने अपनी सारी भावनाओं को किसी संदूक
में बंद कर के चाबी कहीं दूर फेंक दी और अपने चेहरे पर कठोरता का
मुखौटा लगा कर रहने लगी।
धीरे धीरे इस क्रोध और आक्रोश को अपने नन्हे बेटे पर भी उतारने
लगी। नन्हे से चिंटू न एक दिन ये अपने शिक्षक माधवेन्द्र को
बताया और इस तरह नियति ने माधवेन्द्र को नियति के सामने
खड़ा कर दिया।
धीरे धीरे माधवेन्द्र उसकी ऊष्मा को पीता गया और अपनी
शीतलता उसमे भरता गया। भावनाओं की संदूक की चाबी भी ढूंढ
लाया।

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‘घर आ गया नियति’- माधवेन्द्र की आवाज़ से उसकी तन्द्रा भंग हुई
और वो वर्तमान में लौट आयी। माधवेन्द्र अब उसका पति था।
स्कूटर से उतरते हुए मन ही मन प्रण लिया अपने क्रोध और अपने अंदर
की कर्कशा को किसी संदूक में बंद कर के चाबी कहीं दूर फेक आने
का और मुस्कुराते हुए माधवेन्द्र के गले लग गयी।

लेखिका:प्रीति पराशर

पूर्व प्रकाशन: The Anonymous Writer हिंदी फेसबुक पेज

1 thought on ““कर्कशा”

  1. very very very nyc .. bahut dino bad is tarah k likhne k style ko dekha… i am very fond of reading stories.

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