कहानी सीतामढ़ी के एक तालाब की।

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आज पूरी दुनिया जल संकट से जूझ रही है। भारत भी उससे अछूता नहीं है। इस बार जितनी गंभीर रूप से जल संकट उभर कर सामने आया है शायद पहले कभी न आया था। जल संकट एक सबसे बड़ा कारण है तालाबों की संख्या में गिरावट आना। हमारे देश में आदिकाल से ही अनगिनत तालाब थे इसलिए कभी जल संकट ज्यादा नहीं हुआ। पीने की पानी की समस्या तो कभी थी ही नहीं। लेकिन आधुनिकीकरण के इस दौर में विकास के नाम पर पर्यावरण का जो नुकसान पिछले 2-3 दशकों में हुआ वैसा कभी नहीं हुआ। परिणाम है की आज अनेक हिस्सों में लोग पीने के पानी के लिए तरस रहे है।और दिन प्रतिदिन यह समस्या विकराल रूप धारण करते जा रही है। ऐसे में जरुरत है पुनः तालाबों और कुओं की और लौटने का और उन्हें फिर से पुनर्जीवित करने का। भूजल पर कम से कम निर्भरता होनी चाहिए।20160704_061204
इस कड़ी में आज हम बात करेंगे अपने सीतामढ़ी जिले के एक तालाब की और उसकी पौराणिक महत्व की।यह तालाब हमारे जिले के सोनबरसा प्रखंड के कन्हौली पंचायत में आता है। इस तालाब का नाम छपकाहींं पोखर है।बहुत ही सुंदर तालाब हुआ करता था। आज इसकी स्थिति दयनीय अवस्था में है। किसी का ध्यान इस ओर नहीं है। इस तालाब में दूर दूर से लोग स्नान करने आते थे।ऐसा माना जाता है की यहाँ स्नान मात्र से सभी प्रकार के चर्मरोग दूर हो जाते है। आज भी कभी कभी कोई चला आता है लेकिन तालाब की दुर्दशा देख कर शायद ही स्नान करता है। एक घाट भी बना हुआ है इसके पश्चिमी तट पर जो आज टूटे फूटे अवस्था में है। जल कुंभी की चपेट में आज तालाब मृतप्राय स्थिति में है। इसकी पौराणिक गाथा के बारे में मुझे जानकारी मिली तो मैं वहां गया और ऐसे तालाब की दुर्दशा देख कर व्यथित हो गया। अगर स्थिति ऐसी ही रही तो वो दिन दूर नहीं जब हम एक और तालाब और जल स्रोत खो देंगे। इस तालाब के निकट एक मठ भी है जहाँ लोग भगवन शंकर की पूजा अर्चना करने आते है। विभिन्न अवसरों पर मेला भी लगता है। आसपास के कई गावों के लोग उसे आते है। लेकिन कोई भी जनप्रतिनिधि तालाब की ओर ध्यान देने की कोशिश नहीं की।
उम्मीद है की यह आवाज उचित स्थान पर आपके माध्यम से पहुँचेगी और ऐसे तालाबों को फिर से पुनर्जीवित किया जायेगा। ऐसे असंख्य तालाब आज कराह रहे है जो धीरे धीरे परंपरा और संस्कृति को भी अपने अन्दर समेटे हुए सिकुड़ रहे है। एक पहल तालाबों और संस्कृतियों को बचाने की।

धन्यवाद्।

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