“कोना”

घर के कोनों में रहने वाले बच्चे,
एक दिन निकल पड़ते हैं,
ढूँढने अपना कोना,

और छोड़ जाते हैं घर में,
जाने कितने कोने,
जिन से समेट कर मां
रखती है चीज़ें एक कोने में,

फिर खुद एक कोने में बैठी ,
इंतज़ार करती है अपने,
बड़े हो चुके बच्चों का,
उनके कोनों के खिल उठने का,

और एक दिन लौट आते हैं बच्चे,
पर अब कोनों में उनका गुजारा कहाँ,

उन्हें आधिपत्य चाहिए पूरे घर पे,
और दे देते हैं माँ को एक कोना,
माँ बैठे बैठे कोने से देखती है सब कुछ,
फिर एक दिन छोड़ जाती है कोना,
जो इंतज़ार करता है एक नए साथी का….

-प्रीति पराशर

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