क्या आप सच मे गौरक्षक हो या फिर मानव भक्षक? -आनंद

क्या आप सच मे गौरक्षक हो या फिर मानव भक्षक?-

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गौरक्षा या फिर गौ सेवा का देश में ऐसा मुद्दा है जिसे सब अपने अपने तरीके से हैंडल करना चाहता है, चाहे देश में लॉ एंड आर्डर की सिचुएशन भले खराब हो जाए, आज गौ माता की शक्ति का आलम ये है कि इसके नाम पर सरकार बन भी सकती है सरकार गिर भी सकती है,अपनी मर्जी की घर में सब्जी न बनवा पाने वाले लोग भी, इस मुद्दे पर सरकार को बनाने बिगाड़ने की बात करते है.

लईकपने से हम सबको ठोंठी पकड़-पकड़ के टीचर सबसे ज्यादा किसी चीज पर निबंध लिखवाए है तो वो है गाय, चार गो टंगरी होता है, 2 गो कान होता है, घर परिवार में हम सबको बताया गया है कि गाय हमारी माता है, हम सभी मानते भी है, ताजा मामला है कि परसो तरसो का, न्यूज देख रहे होंगे तो पता ही होगा।

राजस्थान मेवात की नूह तहसील में रहने वाला 55 साल का पहलू खान पिछले शुक्रवार एक दूध वाली भैंस खरीदने अपने गांव जयसिंहपुर से जयपुर के लिए गया था। वह एक डेयरी किसान था, जिसने सोचा था कि वह रमजान के दौरान अपने दूध का उत्पादन बढ़ा ले। लेकिन शनिवार को जब गाय बेचने वाले ने पहलू खान के सामने ही 12 लीटर दूध निकालकर दिखाया तो पहलू ने भैंस की जगह गाय ही खरीद ली जाए। गाय खरीद कर लौटते समय जब अलवर के बहरोर इलाके में कुछ कथित गौ रक्षकों ने उनपर हमला कर दिया। उसके पास जयपुर नगर निगम (सीरियल नंबर 76324) की रशीद भी थी,  रशीद छीन के फाड़ दिया, लाठी डंडा से इतना पीटा की पहलू खान की मौत हो गई। पिछला साल इंटॉलरेंस वाला इश्यू भी बिसाहड़ा वाले अखलाक के हत्या पर उठा था, पूरा देश बउरा गया था, आमिर खान की बीबी तो देश छोड़ कर जाने को तैयार हो गई थी।

लेकिन केवल गाय के साथ किसी समुदाय विशेष को दिखने पर ही मारने पर उतारू हो जाना, इसके लिए जबकि पशु तस्करी को लेकर राजस्थान में कड़ा लॉ भी है, ये तो अराजकता(Anarchy) है, लोकतंत्र भीड़तंत्र में तब्दील होने लगे और भीड़तंत्र द्वारा संचालित होने लगे तो देश गृहयुद्ध की चपेट में आने लगता है और गृह युद्ध की वीभत्सता कैसी होती है, गुगल पर सीरिया टाईप कीजिए, अंखिया के सामने सब दिखने लगेगा, 3-4 लाख लोग मरे है बिना मतलब में वहां, केवल पोलिटिक्स के चक्कर में, वहां की असद सरकार ने केमिकल वीपंस भी अपने नागरिकों पर अभी यूज कर दिया है, आज तो यूएसए मिसाईल भी दागने लगा है सीरिया में, ये वाकई में तीसरे विश्वयुद्ध की आहट है।

खैर, गौ हत्या को प्राचीन काल की से इसे कनेक्ट करें तो

गो हत्या और गोमांस खाने के पक्ष-विपक्ष में कुछ तर्क रख रहे हैं.

(तर्क में विलीव करते हैं तो ही पढ़े What’s up-फेसबुक पर बउआने वाले अर्जी-फर्जी फोटो और फर्जी आर्टिकल पढ़ कर बउरा जाने वाले न पढ़े न तो 100-150 गाली पक्का मुझे दोगे, आप ये भी सोच रहे हैं कि पक्ष-विपक्ष कपार कर रहा है, साफ साफ लिखो न बे, तो सोचते रहिए हम स्टूडेंट है और मास्टर साहेब हो या फिर UPSC कहती है कि क्लियर सोचो बे, जो लउकाता है, समाज मे जो चल रहा है न उहे लिखो, Biased नहीं)

गोमांस खाने के विरोध में ग्रंथो मे वर्णन.

  1.  ऋग्वेद में

हमारे सबसे प्राचीन स्रोत ऋगवेद में गाय को न मारने योग्य यानि की अघन्या कहा गया है,  इतिहास के NCERT किताब धूल फांक रहा होगा गर्दा झारिए और ऋगवैदिक काल खोलिए और एक पेज उल्टाईए लौउका जाएगा.

2. अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि

यजुर्वेद १।१

हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो.

(यहां सभी पशु की बात हो रही है न कि केवल गौ माता की, गाय को हम मां तो मानते है लेकिन बकरे, मुर्गा, सुअर को बड़े चाव में हमारे समाज में खाए जाते है).

यजुर्वेद में यज्ञ-पूजा में हिंसा का विरोध किया गया है, अध्वर इति यज्ञानाम – ध्वरतिहिंसा कर्मा तत्प्रतिषेधः

वेदों में यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म या एक ऐसी क्रिया कहा गया है जो वातावरण को अत्यंत शुद्ध करती है.

जैसी कुछ लोगों की प्रचलित मान्यता है कि यज्ञ में पशु वध किया जाए तो देवी मईया जल्दी खुश हो जाएगी।

हे महारानी जी – “हमर बचबा के बीमारी ठीक हो जतई न तो खंसी (बकरी) चढ़ईबो”

हमारी सनातन संस्कृति की बात ही अलग है, हमने हर जीव में प्राण देखा है, पत्थरों को भी पूजते हैं लेकिन अपन बचबा के बीमारी ठीक करवाने के लिए निरीह, निर्दोष, मूक जानवरों की बलि चढाएंगे, ऐसे पोंगा पंडितों की फिलास्फी के अनुसार गढ़ी माई तो एकदमें गदगद हो जाती होंगी न, क्योंकि वो खून की प्यासी है.

अबे, पोंगा पंडितो, नहीं वो मां है, करूणा, दया की वो प्रशांत महासागर है, क्या मां कभी चाहेगी कि जिस सृष्टि की रचना अपने हाथों से इते प्रेम से उन्होंने की है उसका खून पीकर क्या वो खूश होती होंगी।

A buffalo is sacrificed near Gadhimai Temple

(उपर की पशुबलि वाली तस्वीरे Panic क्रियेट करने वाली है लेकिन यथार्थ है और यथार्थ से मुंह मोड़ना शुतुरमुर्ग की तरह माटी में गर्दन गोंत लेने के बराबर होगा और मैं तो मुंह नहीं मोड़ना चाहूंगा).

ये तस्वीरें हैं नेपाल के गढ़ी माई की, मां को गांव में माई बोलते हैं, एक अलगे प्रेमत्व का फीलिंग आ जाता है, मां और बेटे का रिलेशन ही ऐसा है, मेरे दर्शन के अनुसार मां की छवि सिर्फ गले लगाने की है, रोते वक्त चुप कराने वाली जैसी है, हां गलती करूं तो डांट कर मुझे चुप कराए वैसी मां है, मैं भगवती को मां के रूप में मानता हूं उस मां के रूप में जो हमेशा मेरा मार्गदर्शन करें, हमेशा मेरी मदद करें, मेरी हमेशा मदद करते हैं लेकिन मैं कभी उस मां से ये न मांगता हूं की हे मईया UPSC क्रेक करवा दोगे तो बकरी को चढ़ाएंगे और उसके मीट को सपरिवार बड़े चाव से प्रसाद के रूप में खाएंगे।

खैर,ये मेरी सोच है, सबकी अलग हो सकती है, मुझे किसी पर अपनी सोच थोपने का अधिकार नहीं हैं।

गढ़ी माई की बात करे तो

यह बलि प्रमुख रूप से भैंस महिष की होती है (जिसे जल महिष कहा जाता है) लेकिन उसकी बलि के साथ साथ बकरी , मेष , सूअर , मुर्गा और कबूतर इत्यादि की भी बलि दी जाती है । बलि एक दिन नहीं पूरे महीनें भर चलता रहता है । पशुओं की बलि इस हद तक दी जाती है कि पिछली बार हुए बलि आयोजन के दौरान न केवल

पशुओं की कमी हो गई थी बल्कि भक्तों को उसके मांस की भी कमी हो गई थी । उस समय सरकार नें रेडियो से घोषणा करके किसानों को देवी की प्रसन्नता के लिए अपने पशुओ को बेचने के लिए कहा था ! इस कत्लगाह में इस दौरान की अफरातफरी और चीख पुकार दिल दहलाने वाला होता है, ऐसा लगता है मानो पूरा प्रांगण ही खून का तालाब बन गया हो । इस बलि का दृश्य बीभत्स होता है क्योकि बहुतेरे तो वहां खून पीते हुए भी दिखते हैं। बलि में काटे गए पशुओं को पड़ोस के गावों में ले जाया जाता है जहाँ सारे गांव के लोग उसे प्रसाद रूप में वितरित कर लेते हैं और अपने घर में पका कर खाते हैं। उनका मानना है कि यह प्रसाद अशुभ को ख़त्म कर उनके यहाँ शुभत्व ले आता है। इस बलि आयोजन के दौरान यह विश्व का सबसे बड़ा स्लॉटर हाउस बन जाता है।

गौरतलब है कि देवी के मंदिर में इस दौरान आये श्रद्धालुओं में और बलि करनें वालों में 70% उत्तर प्रदेश , बिहार और बंगाल से होते हैं क्योकि इन राज्यों में बलि प्रथा पर कमोवेश बैन है.

गोमांस खाने के पक्ष में महाकाव्य महाभारत मे जिक्र,

1. महाभारत में रंतिदेव नामक राजा का वर्णन मिलता है जो गोमांस परोसने के कारण यशस्वी बना, महाभारत, वन पर्व (अ.208 अथवा 199) में आता है।

राज्ञो महानसे पूर्व रन्तिदेवस्य वै द्विज

द्वे सहस्त्रै तु वध्येते पशूनामन्वहं तदा

अहन्यहानि वध्येते द्वे सहस्त्रे गवां तथा

समांसं ददतो हान्नं रंतिदेवस्य नित्यशः

अतुला कीर्तिभवन्नृपस्य द्वजसत्तम – महाभारत, वनपर्व 208 199/8-10

“राजा रंतिदेव की रसोई के लिए दो हजार पशु काटे जाते थे. प्रतिदिन दो हजार गौएं काटी जाती थीं मांस सहित अन्‍न का दान करने के कारण राजा रंतिदेव की अतुलनीय कीर्ति हुई. इस वर्णन को पढ कर कोई भी व्‍यक्ति समझ सकता है कि गोमांस दान करने से यदि राजा रंतिदेव की कीर्ति फैली तो इस का अर्थ है कि तब गोवध सराहनीय कार्य था, न कि आज की तरह निंदनीय”

खैर ग्रंथो मे कुछ भी लिखा हो लेकिन, किसी घटना का केवल प्राचीन ग्रंथ में उदाहरण मिलने से ही ऐसी घटनाएं नियम तो नहीं न बन जाती है, संस्कृत में लिखा हर ग्रंथ अनुकरणीय भी नहीं है, हमें इहां ई भी तो सोचना चाहिए कि उस युग का कल्चर क्या था, आदर्श क्या था? प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर हो या रामशरण शर्मा फिर बाद में ई बतिया भी कहते है कि तब भी मनुष्य गौ के प्रति सम्मान भावना रखता था। न कि केवल गो मांस खाना ही उसका आदर्श था, और हम सब तो मनुष्य ही है कभी भी धर्मशास्त्र का अक्षरशः पालन किए नहीं है, लेकिन किसी को केवल गाय के साथ देखने पर ही उसको बिना कारण पीट-पीट कर हत्या कर देना ये वाकई में अराजकता है.

 

इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 6 अगस्त 2016 को  ‘टाउनहॉल’ वाले कार्यक्रम में दिए गए भाषण का जिक्र करना चाहूंगा —-

उन्होंने कहा था कि “कुछ लोग गौरक्षक के नाम पर दुकान खोलकर बैठ गए हैं. मुझे इस पर बहुत ग़ुस्सा आता है.” उन्होंने ये भी कहा, “80% कथित गौरक्षक पूरी रात असमाजिक कार्यों में लिप्त रहते हैं और दिन में गौरक्षक का चोला पहन लेते हैं. मैं राज्य सरकार से कहता हूं कि वे ऐसे लोगों का डोज़ियर बनाएं.” ये कथित गौरक्षकों जो वास्तव में गौरक्षक है उनको बदनाम करते हैं, वे गाय को प्लास्टिक खाने से बचाएं, ये बड़ी सेवा होगी. उन्होंने ये भी कहा कि कोई स्वयंसेवा किसी को दबाने के लिए नहीं होती”.

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ जी ने भी अवैध बूचड़खाने को बंद करवाया है, लेकिन जहां लोग लॉ एंड आर्डर की सिचुएशन बिगाड़ने की बात आती है वो भी इन फर्जी गौरक्षको को नहीं बख्शेंगे।

देखिए ई जो गौहत्या पर हिंदू मुस्लिम विवाद चल रहा वो सुलझेगा कैसे-

हम सभी इस समाज के हिस्सा है, पोलिटिशियन तो चाहते ही है कि हम लड़ते रहे तभी तो उसका वोट बनेगा, समाज आगे आए, तभिए बात बनेगी, हम सभी को एक दूसरे धर्म, संप्रदाय का सम्मान करना चाहिए, भड़काने वाले तो बहुते मिलेंगे लोकिन जोड़ने वाले कम ही मिलते हैं,

सबसे बेहतरीन बात परसो ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड  ने

कही है, केंद्र सरकार से कहा है कि गो हत्या को पूरे देश में बंद होनी चाहिए। क्योंकि इससे हिंदुओं का आस्था जुड़ा हुआ है, बोर्ड की ओर से बोलते हुए मौलाना एजाज अतहर ने कहा, “हमें इराक से फतवा मिला है, जिसके मुताबिक गायों की हत्या नहीं की जानी चाहिए क्योंकि इससे हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं। इसलिए, तुरंत प्रभाव से इसपर रोक लगनी चाहिए।” अतहर ने कहा कि बोर्ड इस फतवे के बारे में मुस्लिम समुदाय को जागरुक करेगा। उन्होंने कहा, “शियो मौलवियों ने इसी तरह का फतवा भारत में 40 या 50 साल पहले जारी किया था। उस समय के प्रस्ताव में कहा गया था कि हम जिस देश में रहते हैं उसी के नियमों का पालन करना चाहिए।”

बोर्ड ने तो अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का भी स्वागत किया है। बता दें कि हाल ही में कोर्ट ने राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद को “संवेदनशील” और “ भावुक” मुद्दा बताते हुए सलाह दी थी कि इसका समाधान आपसी सहमति से निकालना चाहिए।

अजमेर के सूफी संत हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के वंशज एवं वंशानुगत सज्जादानशीन एवं दरगाह के आध्यात्मिक प्रमुख दरगाह दीवान सैय्यद जैनुल आबेदीन अली खान  ने कहा कि बीफ के मांस को लेकर देश में दो समुदायों के बीच वैमनस्य पनप रहा है। वैमनस्य पर विराम देने के लिए सरकार को देश में गोवंश की सभी प्रजातियों के वध और इनके मांस की बिक्री पर व्यापक प्रतिबंध कर देना चाहिए।

खैर, ये उनके विचार है

लेकिन रियलिटी क्या है, इधर देखिए

भारत विश्व में सर्वाधिक पशुधन वाला देश है, बीफ (गोमांस) को लेकर भाजपा चाहे कितना भी हल्ला मचाए पर सच यह है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद न केवल मांस का निर्यात बढ़ा है बल्कि नए बूचड़खाने खोलने व उनके आधुनिकीकरण के लिए 15 करोड़ रुपए की सबसिडी दी रही है। सबसे अहम बात तो यह है कि भले ही हिंदूवादी संगठन धार्मिक आधार पर इसका विरोध कर रहे हों पर सच्चाई यह है कि देश के सबसे बड़े चार मांस निर्यातक हिंदू हैं। आम धारणा यह है कि मांस का व्यापार गैरहिंदू विशेषकर मुसलमान करते हैं पर तथ्य बताते हैं कि देश के सबसे बड़े चार मांस निर्यातक हिंदू है। ये हैं – अल कबीर एक्सपोर्ट (सतीश और अतुल सभरवाल), अरेबियन एक्सपोर्ट (सुनील करन), एमकेआर फ्रोजन फूड्स (मदन एबट) व पीएमएल इंडस्ट्रीज (एएस बिंद्रा)।

बीफ निर्यात में भारत के पहले नंबर पर आने की वजह यह है कि यहां का मांस सस्ता होता है क्योंकि यहां दूध न देने वाले या बूढ़े पशुओं को काट देते हैं, जबकि ब्राजील व दूसरे देशों में मांस के लिए ही पशुओं को पाला जाता है जिन्हें खिलाने का खर्च काफी आ जाता है।

जहां दुनिया को बीफ का निर्यात कर भारत मोटा मुनाफा कमा रहा है वहीं देश में इसकी खपत में कमी आई है। इसकी जगह मुर्गों की खपत बढ़ी है। अहम बात यह है कि मुस्लिम बहुय जम्मू-कश्मीर में बीफ की बिक्री पर प्रतिबंध लगा हुआ है।

राजनीति से अलग धननीति:

राजग की सरकार ने मांस उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नए बूचड़खाने स्थापित करने व पुरानों के आधुनिकीकरण के लिए अपने पहले बजट में 15 करोड़ रुपए की सबसिडी का प्रावधान कर दिया। ’इसके नतीजे सामने आए और पहली बार देश को बासमती चावल की तुलना में कहीं ज्यादा आय मांस के निर्यात से हुई है। उसने पिछले साल 4.8 अरब डालर की विदेशी मुद्रा अर्जित की। ’वर्ष 2014-15 के दौरान भारत ने 24 लाख टन मीट निर्यात किया जो कि दुनिया में निर्यात किए जाने वाले मांस का 58.7 फीसद है।

उपर में कई डाटा है ये मै नहीं कह रहा हूं Govt. of India का डाट है, जिसे मैंने देश के प्रमुख अखबार इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू  एवं नेट  से ली है.

सोशल मीडिया पर जुड़े होने के नाते मैने अपना view आर्टिकल के माध्यम से रखा है, अच्छा लगे तो ठीक बुरा लगे तो मैं क्या कर सकता हूं. लेकिन एक सवाल छोड़ता जाता हूं.

गौ रक्षा की आड़ में किसी की पीट पीट कर हत्या करने वाले गौरक्षक है या फिर मानव भक्षक?

धन्यवाद, जय हो

— आनंद

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