ग्रामभोज से बुफे सिस्टम तक – आनंद


उत्तर वारी टोले के जोखन बाबा, विरंदर बाबू और परमेशर चिलम सुलगाते हुए एंड्रायड मोबाईल पर पोता से जियो डाटा ऑन करवाके मोदी जी के इजरायल दौरा पर दिए गए भाषण सुन के एनालिसिस कर रहे हैं, डिजिटल इंडिया केतना सफल हुआ ये बता रहे है। चिलम भी सुरुक रहे है, चिलम के बारे में क्या कहे कितना भी बड़ा जातिवादी मनुवादी क्यों न हो,  चिलम और खैनी सबको एक श्रेणी में ला खड़ा कर देता है गुरू।

पड़ोस घर मे संगितिया भउजी सैमसंग मोबाईल से वीडियो कॉलिंग करके नोएडा में दिनरात मेहनत कर रहे, अपन रजूआ सजन से पैर में बिछिया और भागलपुरिया सिल्क साड़ी मंगवाने के लिए फोनवा पर फ्लाईंग किस करके पोल्हा, बतिया रही है, उधर रजूआ का अलसियाह मिजाज भर दिन के मेट्रो और डीटीसी की बस में धक्का खाकर पत्नी से एक बेर बतियाने के बाद हरियर हो गया है, फ्लाईँग किस रिसीव करते ही फूल के बरसतिया बेंग हो गया है, तो भउजी ने फेर एगो डिमांड कर दी है, अगला महीना हमर मउसेरी बहिन के बियाह है, साड़ी त लाईए रहे है, एगो कान में के बाली भी बनवाना है, पईसा सेविंग कीजिए, जल्दी आईए, सोनपट्टी में जाकर बनवाएंगे, फोनवा पर रोमांटिक होते-होते कब दूध उधिया गया पता ही न चला, तभी सासू मां बोली है, ऐ हे बहुरिया तनिका फोनवा दहू त रजूआ के बाबू जी भी बतियतई, रजूआ के बाबूजी के हाथ में फोन आते ही रजूआ इमरान हाशमी से सीधा संस्कारी आलोकनाथ बनके नार्मल हो गया है,                                                             बाबूजी ने गरियाना शुरू किया है – रे बेहुदा तुम पईसा भेजा नहीं, बोला था भेज रहे है, 3 महीना हो गया,  अच्छा छोड़ एक एल.ई.डी टीवी लेते आना, हां और 5 बोरा डी.ए.पी. खाद लेना है, खेत जोतवाना है, तुम धियाने नहीं देता है, छठ मे आने का टिकट करवालो, जिम्मेदारियों का नया-नया डोज पड़ने से पातर तार नियन शरीर वाले रजुआ का माथा अौर बउरा गया है, 12,000 रूपया मंथली सैलरी वाला रजुआ कथि-कथि लाए,  पैर में के बिछिया लाए, कान में के बाली लाए कि बाबूजी को एल.ई.डी. लाकर के दे।

सच में गांव में भी सब कुछ बदल रहा है, जोखन बाबा & कंपनी इजरायल के बारे में मोबाईल पर बैठे-बैठे जान रहे हैं और विदेशनीति पर चिलम पीते-पीते ज्ञान दे रहें है, तो रजूआ के पापा एल.ई.डी. मंगवा रहे है ताकि वो भी देश दुनिया से अपडेट रह सके, निरक्षर सुमित्रा चाची एंड्रायड मोबाईल चला रही है,   रजूआ टाईप केतना गांव के लईका रोजगार के लिए दिल्ली-नोएडा-मुंबई शहर में आकर रह रहा है। धीरे-धीरे गांवो का भी सांस्कृतिक शहरीकरण हो रहा है। होना भी चाहिए लेकिन समन्वय आवश्यक है, 

फिर भी अभी भी गांव और शहर वाले कल्चर में बालि-सुग्रीव वाला डिफरेंस है,

सच मानिए तो दुनिया जितनी तेजी से बदली है उतनी तेजी से हम भी बदल रहे है, लेकिन आज भी गांव में बबलू चचा घी लपेसल तीस गो रोटी लहसुन के अचार, प्याज और हरियर मिरचाई के साथे चांप जाते है और लंगौटा पहिनके जिम में कैप्सूल खाए, प्रोटीन पीए लौंडो को धाकर चुनौती देने की क्षमता रखते हैं, जेएनयू टाईप बुद्धजीवी भले उनको बीस बार समझाए की देखो विश्व में केतना आदमी भूखे मर जाता है, इतना न खाईए, डायटिंग कीजिए हॉट दिखिएगा, लेकिन वो न मानेंगे.

शहर की बात करे तो आदमी यहां डाईटिंग करते है, खुद ही पईसा देते है और खुद ही जिम में दउर के पसीना निकाल के आते है, तीस रोटी में पूरी कॉलोनी खाना खा लेगा लेकिन बबलू चचा पूरी कॉलोनी के आदमी के बराबर फिजिकली मेहनत भी करते है. दिल्ली मेट्रो में कभी कभी मिल जाती है सुखरी बोंबिल सी कुपोषित लड़कियां। शरीर के हिसाब से तो लगता है अंग्रेज, डच, पुर्तगीज, फ्रांसीसियों सभी को लगान चुकाने के लिए खेत में दौन चीर रही थी, धोखा से भी ये लड़कियां चकरका मोबाईल हाथ में रख ले तो एक साईड से उलार होकर चलेगी। सारा क्रीम उरीम पोते सुबह ऑफिस निकलती है, कैटरिना कैफ बनकर, लौटकर आती है तो ओमपुरी बन जाती है, पहचान में नहीं आता है कि अबे सुबह यहीं थी, लेकिन फैशन है गुरू, इन सुखरियों का गांव की दही-घोर-मही-मठा खाई हुई बहनों से फाईट अगर हो जाए तो तीन-चार साल तक अचेतावस्था में रहेगी।

खैर, लोगों को सबसे निकट लाने का काम साथ मे भोजन करना होता है, गांवो मे ग्रामभोज प्रचलित है, सुख हो दुख हो सबकी भागीदारी होती है, याद है जहाँ हम सभी खाने के लिए पांत (पंक्ति) में बैठा करते थे, धान की सूखी डंठल पोरा या पराली कहिए, को इस प्रकार से तैयार किया जाता था कि लोग उस पर बैठ सके। जूता चप्पल को पास में ही रखा जाता, इतनी दूर पर की यहीं बैठे बैठे जूते की निगरानी की जा सके। केला या फिर सागवान के पते की थाली तैयार की जाती थी, सबसे छोटे लड़के के उपर जिम्मेवारी होती थी की तुम पत्तल चलाओ, पत्तल सेलेक्ट टाईम में बहुत झोल होता था, बिना फटा पत्ता सेलेक्ट कर के ओलंपिक विजेता वाली फीलिंग आ जाती थी, इन पंक्तियों के बीच 21 तरह का पकवान वाला द्रुत गति से भ्रमण करता हुआ मिल जाता था, दाल, दाल, दाल लीजिएगा, सब्जी लीजिएगा, सब्जी वाले को कई लोग आईडिया भी दिया करते थे कि भाई परवल, या गोभी चुनकर निकालो, तभी कोई आता था हई पापड़ लीजिए महराज, विभिन्न तरह का आईटम चल रहा होता था, इसी बीच में जोखन बाबा टाईप बुढउ बोल उठते थे कि अरे कैलाश बाबू तनिका शुद्ध घी चलवाईए घी, कैलाश बाबू घी के लिए सबसे उपयुक्त एवं रफ्तार पसंद फास्ट एंड फ्यूरियस वाले विन डीजल टाईप आदमी को सेलेक्ट करते थे, उसकी स्पीड की बात तो पूछिए मत, बुलेट ट्रेन से भी तेजी आगे से निकल जाता था, लेकिन प्रतिभा देखिए सब के पत्तल पर घी जरूर उपयुक्त मात्रा में होता था, बगल वाली पांत वाले लोग तो बड़ी आशा भरी निगाहों से देख रहे होते थे कि अबे उधर चल गया, अपने इधर तो आया ही नही, तभी बिरेंद्र बाबू बोल उठते थे कि जोखन बाबा घी खाए थे सुनिलबा के बरियाती में गरदा उड़ा के न खियाया था महराज, पूरा घी में बने पकवान ठूंस-ठूंस के खाए थे, ठहाका उठ जाता था, अच्छा, कुछ रिश्तेदारों को जबरदस्ती एक्स्ट्रा पूरी या सब्जी खाने के लिए डाला जाता था, इसके लिए पास में बैठे रिश्तेदार जिम्मेदार होते थे, डालिए-डालिए महराज, सारा भकच देंगे। जबरदस्ती खिलाने में भी प्यार छिपा होता है, इन खान-पान के बीच विभिन्न विषयों पर चर्चा चलता रहता था, खाने के पश्चात सबसे उपयोगी वो व्यक्ति होता था जो पानी चला रहा होता है, उसे आदरसहित बुलाया जाता था, चूंकि वो पानी नहीं देगा तो बिना हाथ धोए जाना पड़ेगा, रात में चापाकल कहां ढूंढा जाएगा। खैर, आज भी मुझे जब भी मौका मिलता है तो जमीन पर बैठकर इन भोजों में खाना पसंद करता हूं।

लेकिन ये बुफे प्रणाली ने धीरे-धीरे अपनी पैठ गांव में भी बना ली है, लोगों के पास इतना समय नहीं है कि वो अपने हाथ से अपने सगे संबंधियों, मित्रों को खिला सके, खिलाने के समय की वो तकरार, प्यार, दुलार वाकई में मेमोरेबल है, समय मिले तो कभी याद करके देखिएगा। बुफे पार्टीज के बढ़ने से जहाँ लोगों की जिंदगी आसान हुई है तो वहीं शादी व्याह का खर्च भी बढ़ा है, बुफे पार्टिज में अधिकांश लोग एके बेर में थाली में लाद-पाद के निकल लेते है फिर आने में कहीं भीड़ न हो जाए, कईयों को तो लाज भी लगता है, चार टाईप का सब्जी, भात दाल, रोटी, रायता, मिठाई अलगे गुरुक रहा होता है, सब एके थाली में हाथ में लिए बउआना पड़ता है,तो लगता है कि सोमालिया के बच्चों की तरह भूखे है, कैमरा वाले से भी डर लगता है कि कहीं विडियो न बन जाए, सच में गांव की याद आ जाती है, कि खिलाने के दौरान क्या इज़्ज़त दी जाती थी, जबरदस्ती खिलाने के लिए वो तकरारें, वो प्यार, वो दुलार, बुफे की बात करें तो ज्यादातर लोग अपनी थाली में खाने से ज्यादा रख तो लेते हैं लेकिन खा नहीं पाते तो उसे कूडेदान में फेंक देते है, अन्न की बर्बादी तो हो गई, खर्च ज्यादा होता है, लेकिन गाँवों में भी आजकल खर्चे की परवाह न करते हुए सुविधा पर काफ़ी तवज्जो दी जाने लगी है|

हर आदमी जल्दी में है, जिंदगी की रफ्तार इतनी है कि खुश होने की भी फुरसत नहीं है, प्रतिक्षण आपके सामने नया टारगेट होता है, इन टारगेटों को एचीव करते करते कब गांव से लाकर शहर मे खड़ा कर दिया पता ही न चला, न तो गांव पूर्णतः गांव बचा न शहर पूर्णतया शहर है, काॅंबो हो गया है, रजूआ के बाबू जी एल.ई.डी. पर फिलिमवा जरूर देखेंगे लेकिन ये समय नहीं है कि पड़ोस में क्या सीन चल रहा है, जोखन बाबा के पास पूरे वर्ल्ड को जानने का समय है लेकिन बगल में भूखे पेट सो रहे गरीब के घर क्या चल रहा है इससे मतलब नहीं है। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या फिर भी कम है, लेकिन अब हमारे पवित्र गांवों में कथित शहरीकरण की काली छाया पड़ती हुई दिख रही है। डर है कि कहीं गांव का ग्रामत्व खतरे में न पड़े.
जय हो

— आनंद,

सीतामढी, बिहार

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