“जाने पहचाने से वो चेहरे”

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“जाने पहचाने से वो चेहरे”
जाने पहचाने से वो चेहरे,
जो टकरा जाते है अक्सर,
आते जाते हुए रास्ते में
जैसे पहचानती हूँ उन चेहरों को
वैसे ही उनके भाव भी पढ़ने लगी हूँ।
सुबह मिलते हैं तो हड़बड़ी में होते हैं,
कोई स्कूल की तो कोई कॉलेज की,
किसी को चिंता होती है,
कहीं तनख्वाह न कट जाये देरी के कारण।
फिर शाम को मिलते हैं वही चेहरे
थके हारे से, मन ही मन
दिन भर का लेखा जोखा मापते,
अगले दिन की परिकल्पना करते,
घर लौटते हुए खरीदने वाली
चीज़ों की सूची बनाते हुए,
क्या तुमने भी देखा है कभी गौर से,
उन जाने पहचाने से चेहरों को?

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