डायन और सिसकियां (कहानी) – कुमार आनंद

27_06_2016-witchcraft

एक छोटा सा गांव है केदारपुर, लगभग दो दशक पहले सुमित्रा चाची जेठ के महीने में गांव के दखिनवारी टोले से होकर कहार के कंधो पर ललका पियरका कंबिनेशन के ओहार लगे डोली में आयी थी, गांव की दक्षिणी सीमा पर नदी बहती है, नदी में कमर भर पानी था, नदी क्रॉस करते वक्त भी चाची डोली से बाहर न निकली, डोली से बाहर निकलने और कुछ कहने की कोशिश की पर उन अनजान कहारों से बात न कर सकी, उन कहारों को रामाधीर सिंह (पति) का सख्त आदेश था कि वे रास्ते में कहीं भी किसी चीज का तकलीफ न होने दे, वो कहार भी अपना कर्तव्य समझते हुए चाची को बिना किसी बात की तकलीफ दिए नदी पार कर गए, नंगे पैर जेठ की दुपहरी में कहार चलते रहे, कभी कांटा चुभा तो कभी पत्थर के रोड़े गरें, कभी खेत की पतली मेंड़ वाले रास्ते से गिरते गिरते बचा, अंततः केदारपुर पहुंच गया।

 जब चाची के गोरे गोरे पांव ललका-पियरका महावर लगे केदारपुर गांव में पहली बार पड़ा तो सास सुगिया देवी और देवर रामाशीष सिंह सहित सबने माना कि पूरे केदारपुर मे कोई अगर ऐकरा से सुंदर सुघर दुल्हिन दिखा दे तो नदी किनारे वाला 5 कठ्ठवा खेत हार जाएंगे, पूरे 6 महीने तक पूरे गांव तो गांव पड़ोस के गांव से भी औरतें दुल्हिन देखने आती रहीं। सास सुगिया देवी “साथ निभाना साथिया” सीरियल वाली सास  कोकिला बेन के जैसे कभी गुर्राती तो कभी स्वागत करती, पछियारी टोला के भरत और कमलेश तो बस कोई बहाना से अंगना में आने और भाभी से बतियाने का बहाना ढूंढता था, होली मे चाची के रंग लगाने के लिए गांव भर के देवर और ननद सब बगैर निमंत्रण पहुंच जाते, चाची भी सबका मान रखते हुए खुशी से रंग लगवाती, होली के पुआ और छठ के ठेकुआ खाए के बहाने देवरों की टोली पहुंचती थी, सास सुगिया देवी जल-भून के झरिया के कोयला के खान जईसन हो जाती थी, सुबह-शाम बूढे सास-श्वसुर का पैर दबाना, सबको खाना खिलाने के बाद बचा खुचा खाना खाती थी, कभी सूखी रोटी तो कभी सूखा चावल तो कभी भूखे पेट सोना, फिर सुबह 4 बजे ही उठना, घर से एक किलोमीटर दूर ब्रहम बाबा और महारानी जी को प्रणाम कर वहीं से फूल तोड़ कर आना, अगर रास्ते में कोई चचिया ससुर या अन्य किसी बुजुर्ग को देख दू हाथ नीचे घूंघट डाल लेती, फिर भाग के घर आना ससुर के लिए गरम पानी करना, बर्तन धोना, खाना बनाना सबको खिलाना फिर पूरब की ओर जल चढ़ा कर सूर्य देव से घर परिवार के लिए सुख शांति की कामना करना और दोपहर दो बजे तक खाना, यही दिनचर्या थी उनकी। समय बीतता गया।

एक कहावत है न की चार दिन के अंजोरिया फिर काली रात, चाची के जीवन में अंधेरा आने वाला था और चाची अनजान बने अपने कामों में व्यस्त थी, हर दिन को पूरे दिल से जीये जा रही थी, शादी के 6 साल बाद भी गोद इनकर सूना था, कभी अपनी सास तो कभी पड़ोस वाली चचिया सास कहती की बांझ है, देवर रामाशीष के 2 बच्चों का हवाला देती हुई बोलती कि तुमसे 2 बरिस बाद ऐकर विवाह हुआ फिर दू बच्चे है, तू बांझे रहोगी, करम फूट गया है क्या।

शुरू के कुछ साल तो ऐसे टल गए की अभी उम्र में छोटी है, पर इसके बाद कोहराम ही मच गया, आए दिन ताने सुनने लगी, पहले घर वाले फिर गांव वाले भी उन पर तंज कसने लगे, कई गांवों में आज इस आधुनिक युग में भी एक गलत प्रथा है कि कोई सुबह सवेरे बांझ औरत का चेहरा नहीं देखना चाहता, सुमित्रा चाची के साथ भी यहीं हो रहा था, अचानक से वो समझ नहीं पा रही थी की उनकी गलती क्या है, कभी श्रृंगार करते समय ताने तो कभी पूजा करते समय ताने, ससुराल वालों का इतना खौफ था कि जवाब देने की कभी उनकी हिम्मत नहीं हुई। वर्ष बीतते गए, कभी स्कूल जा रहे बच्चों को निहारती तो कभी उन्हे बुला दुलार करती, कभी मिसरी तो कभी चीनी उन बच्चों की जेब में डाल देती। पंछियों से भी दोस्ती हो चुकी थी चाची की, पूरब की ओर से कबूतरों का झुंड हर रोज आता, एक अजीब जुड़ाव हो चुका था,  हर रोज चावल फटकने के बाद बचे उसना चावल उन कबुतरों के लिए बचा कर रखती थी और दरवाजे के बायीं ओर 10 कदम दूर आंचल डालकर ही निकलती और उन कबूतरों को दाने डालती। भगवान से भी बस दुआएं मांगते रहती, रोती रहती, सिसकती रहती।

कुछ समय बाद पड़ोस के ही पंडित जी गणेश मिश्र को एक पुत्र हुआ, कई वर्षों बाद गणेश मिश्र के घर भी किलकारियां गूंजी, मिसिर जी ने पूरे टोले, मुहल्ले को बुला भोजन कराया, सुमित्रा चाची भी गई, सुमित्रा चाची के चेहरे पर वर्षों बाद उस बच्चे को गोद में लेने के बाद खुशी दिखी, उस बच्चें को सबने आशीर्वाद दिया, सास और पड़ोसियों को चाची पर ताना मारने का एक और मौका मिला, लेकिन वो कहती भी क्या, अब तो रोज का था ।

दुर्भाग्यवश गणेश मिश्र के उस नवजात की अचानक से तबीयत खराब हो गई, गणेश जी ने उसे अस्पताल में न दिखा कर स्थानीय ओझा को दिखाया, ओझा ने उस बच्चे की झाड़फूंक की और उनसे कहा की इस बच्चे को डायन की बुरी नजर पर गई है अब झाड़फूंक के बाद ठीक है और साथ ही उनसे कहा की सुमित्रा चाची डायन है उसी ने इस बच्चे को गोद में खिलाने के दौरान डायन विद्या का मंत्र पढ़ दिया है। लेकिन अब ठीक हो जाएगा, 4 दिन बाद ही उस बच्चे मृत्यु डायरिया से हो गई, सारी खुशियां पल में दुख में बदल गई। सबने इस दुख की घड़ी में मिसिरजी को ढाढ़स बंधाया, सुमित्रा चाची भी गई, चाची का दिल से लगाव था उस बच्चे से, खूब रोयी। लेकिन लोगों की नजरों में उनका एक अलग प्रतिमान बन चुका था, वो अब सुकुमार बहु नहीं रही केवल उस पाखंडी ओझा की वजह से एक डायन का कलंक लगा दिया गया, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

 स्कूल जा रहे बच्चों को उनके मां बाप ने भी उनके आस पास जाने से मना कर दिया, अब तो कोई उनसे न मिसरी लेता न कोई बात करता। अब आस पड़ोस किसी का तबीयत खराब होता तो लोग उन पर ही आरोप लगाते, पछियारी टोले के एक जमींदार को कैंसर हो गया, तो वो अपने 3 बेटे के साथ उनके दरवाजे पर आया और गाली गलौज करने लगा था, इनके पति  ने उन्हे लाख समझाने की कोशिश की लेकिन वो बेवकूफ कैंसर ठीक कराने की मांग कर रहा था। उसके चले जाने के बाद सास और ससुर द्वारा इन पर दवाब डाला जाने लगा, की तू कौन सी विद्या सीख ली, कितने बच्चों को खाएगी, किस किस को मारेगी, कुलक्षिणी, कुल्टा, बांझ कह प्रत्याड़ित किया जाने लगा।

चाची कबूतरों को दाना खिला रहीं थी, छोड़ के अपने कमरे में चली आई उस दिन आखिरी बार जी भर कर रो लेना चाहती थी। अपने ससुर के लिए जिन्हें वो बाबूजी कहती थी, अपने सास के लिए जिसने पहली बार उनके आगमन पर बेटी कह कर पुकारा था, अपने पति के लिए जिसके साथ सात जनम के फेरे लिए थे, उन छोटे छोटे बच्चों के लिए जिनकी मुस्कान के लिए उनकी जेब में वो मिसरी डाला करती थी, उन कबूतरों के लिए जिनका उनसे अगाध स्नेह था,  अब और इस परिवार के लिए संकट नहीं बनना चाहती थी। डायन का ये कलंक लिए अब नहीं जी सकती थी। मक्के की जड़ में रखने के लिए पिछले सप्ताह सल्फास आया था, खाकर आखिरी बार अपने पति को देखकर, गांव के ब्रह्म बाबा को पूज कर रात को सोयी थी सोयी ही रह गई। लेकिन वो परिवार सूना हो गया, पूरा परिवार वहीं था, बस कमी थी तो उस बहुरानी की, उन मूक पंछियों को अब भी चाची की तलाश थी, उन बच्चों को अब भी चाची की जरूरत थी, लेकिन वो अब जा चुकी थी।

— कुमार आनंद  

 

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