निर्भया को मिला न्याय

निर्भया को मिला न्याय

गली मुहल्ले मे भी दो पियक्कड़ आपस मे कुत्ता बिल्ली जईसे लड़ता है तो क्या बोलता है, चलो court में फरिया लेंगे, क्योंकि उसे पता है कि न्याय उसे और कहीं नहीं court में ही मिलेगा, उम्मीदों का महासागर है court,

हर जगह से ठोकर खा चुके लोगों को अगर कोई उम्मीद की किरण दिखती है तो वो न्यायपालिका की चौखट से,

यहीं आ दरवाज़े पर गुहार लगाते है, कितने दबाव, अभावों में न्यायपालिका काम करती है Chief Justice of India ने कई बार बताया है, लेकिन न्याय पाने की उम्मीदें कभी खत्म न होती, कई बार जोक्स भी बनते है, आरोप लगते है, लेकिन आम लोगों की उम्मीदें कोर्ट से कभी न खत्म होती,

कल दो बजे जब supreme court ने निर्भया के हत्यारों को दी जाने वाली फांसी सजा बरकरार रखी तो पूरा कोर्ट तालियों से गूंज उठा और हां इन तालियों के बीच यहाँ भी Human right का चोगा पहिने कुछ सुतिए दबी जुबान से ही #Shame #Shame बोल रहे थे, ये वही लकड़बग्घे है जो 200 लोगों की हत्या के आरोपी आतंकवादी याकूब मेमन को फाँसी से बचाने के लिए 3 बजे भोरबा में कोर्ट खोलवाए थे.

supreme कोर्ट ने निर्भया के साथ जो अपराध हुआ उसे रेयरेस्ट आफ द रेयर माना है, 16 december, 2012 को निर्भया साथ जो हुआ, उसने देश के अवचेतन को हिलाया, झकझोरा सहमाया और हिम्मत दी कि ऐसे जघन्य अपराधों के खिलाफ एकजुट हो जाए। हमने, आप ने, सभी ने अपने स्तर पर इसका प्रतिरोध किया, दुःख जताया, निर्भया के परिवार के साथ पूरा देश रोया, Court का कहना है कि

ऐसा लगता है कि यह किसी अलग दुनिया की कहानी है।  पाशविक यौन आकांक्षा से ग्रसित ये मनुष्य हमारे आपके बीच के ही है, निर्भया के साथ पाश्विक व्यवहार करने वाले ये कौन लोग है, मैं हूं आप है, हम हैं, ऐसी प्रवृत्तियों वाले व्यक्ति किसी दूसरे ग्रह से तो आते नहीं है, ये हमारे समाज से ही है। किसी का भाई, किसी का बेटा तो किसी का पति है।

यह सिर्फ एक निर्भया या उसके परिवार की लड़ाई नहीं थी बल्कि यह देश की सभी निर्भया की लड़ाई थी

Supreme court से हमें यहीं उम्मीद थी कि कम से कम इस मामले मे ऐसा verdict जरुर आए जो एक नजीर बन सके, समाज में यह संदेश जाना जरूरी है कि जब किसी लड़की के साथ बर्बरता की जाएगी तो कानून उनको छोड़ेगा नहीं, 1594 दिन बाद इस verdict सुन करेजा ठंडा गया. लेकिन निर्भया का सबसे बड़ा और सबसे क्रूर अपराधी अफ़रोज़ है, जिसने उस रात सबसे वहशियाना ढंग से निर्भया के ऊपर अत्याचार किया था, जिसे सिर्फ एक स्कूल के सर्टिफिकेट के आधार पर जुवेनाइल मान कर 3 साल के लिए सुधार गृह भेजा गया था, जिसकी उम्र की जांच के लिए “बोन टेस्ट” तत्कालीन सरकार ने कराने से मना कर दिया था, शायद सिर्फ इसीलिये क्योंकि उसका नाम “अफ़रोज़” था। कि वोट बैंक न खराब हो जाए, अपराधी को अपराधी की नजर से देखा जाना चाहिए न कि धर्म विशेषता के नजर से, एक सभ्य नागरिक बनाने के लिए उसे बाल सुधार गृह से भेजा गया था, अब वो रिहा हो चुका है, व्यवस्था में खामी यहां दिखी थी, हालांकि ये प्रावधान अब खत्म कर दिया गया है, 16+ नाबालिगों पर मानसिक उम्र के हिसाब से केस चलेगा. यह एक स्वाभाविक फैसला है, अगर ऐसा न होता तो हम सभी ठगा महसूस करते.

न्याय के इस मंदिर और इसके पूजारियों को नमन __/\__

जय हो.

— आनंद

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