फगुनी महतो & सर्जिकल स्ट्राईक्स (कहानी) – कुमार आनंद

फगुनी महतो & Surgical Strikes (कहानी) – आनंद
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फगुनी महतो जब बेटा के ससुराल से मिले पियरी धोती कुरता पहिने जब झगड़ा सुलह के लिए के ही जमींदार बाबू अवधेश सिंह के पास पहुंचा तो अवधेश के पास बैठे उसके तीन चार निकम्मा, निठल्ला दोस्त सुमित महतो, रौशन सिंह और कृपाली तिवारी से तरह तरह की उसे गालिया सुनने को मिली. निकम्मा, निठल्ला इसलिए क्योंकि ये केवल सभी अपने बाप दादाओं की विरासत में छोड़ी गई संपत्ति को बेच बेच कर, दारू पिया करते थे और चंदेश्वर बाबू के आगे पीछे कर के ब्लॉक, पंचायत में दौड धूप कर के एकदम राजनेता टाईप फीलिंग लेते थे, वहीं किसी गरीब का काम करवाने का 100-50 रूपया लेकर अपना जीवन यापन किया करते थे,
फगुनी का संपूर्ण जीवन बेगारी करते हुए अवधेश बाबू के पिछलगुआ बन के निकल गया था लेकिन फगुनी की दूसरी पीढ़ी इस बेगारी से इन्कार करना चाह रही थी, एकदम पिज्जा बर्गर फैमली टाईप लोगन शायद ई बेगारी प्रथा से अवगत नहीं होगे, आज 21वीं सदी में भी बेगारी गांवों में प्रचलन में है, means – वह काम जो किसी से जबरदस्ती और बिना कुछ अथवा उचित पारिश्रमिक दिये कराया जाय।
कहते हैं कि जब किस्मत महरबान तो गदहा भी पहलवान, अवधेश सिंह के पापा मेहनत से 15 बीघा खेत जमा किए थे, सूखी रोटी, नमक, प्याज, मिरचाई खाकर अर्जित की गई संपत्ति को अवधेश के हाथ में सौंप कर दुनिया से चल बसे थे, 2-3 बीघा नवासा में मिला था, अवधेश एकदम ल़ड़बहेर निकला, पहिले नदी किनारे वाला खेत बेचना शुरू किया, बेचते-बेचते घर किनारे वाला 3 बीघा का एके जगह वाला प्लॉट खेत ही बचा था, उसी में से एक हिस्सा बेचकर कमांडर जीप खरीदा, लेकिन ठहरे राजपूत “प्राण जाए लेकिन वचन जाए के तर्ज पर इनकर प्राण जाए लेकिन अहंकार न जाए।”, बगल के ही एक फेकन साह साथ में ही जीप खरीदा दिने रात मेहनत करता, कमा कमा के एगो जीप से 4 गो खरीद लिया और अवधेश बाबू रोज चिलम सुलगाते, पूरे गांव जवार में सबसे बरियार नगिनीया गांजा के 6-7 कश खींचने वाले एकलौते मरद के रूप में विख्यात थे, 3-4 निठल्लन सहित ताश खेलते और जीप को दरवाजे पर ही लगाए रखते, बीबी रामप्यारी देवी भी वैसी ही निकली, पूरा कल्ला में गुटखा भरे रहती, शिखर इनकर पसंदीदा गुटखा था, फरमाईशी खाना, रोज मार्केट अवधेश बाबू जाते और मुर्गा के टंगरी हरियरका झोरा में अपनी रामप्यारी के लिए ले के आते, रामप्यारी जी टंगरिया खा खा के एकदम फूल के बिगबॉस वाली डॉली बिंद्रा हो गई थी।
फगुनी महतो 14 वर्ष की उम्र से इनके पिताजी के साथ काम किया करता था, देखने में सांवले कम काले फगुनी का घर पड़ोस के कुर्मी टोला में था, बहुत ही नेक,सहृद्य, मिलनसार फगुनी, काम के दौरान जो रूखा-सूखा उसे खाने को मिल जाता वही खा लेता, अवधेश के पापा ने उन्हे दखिनवारी टोला वाला एक 6 कठवा गहिरा वाला बंजर खेत दिया था, कहा कि ई रख लो जमीन, हमरा बहुते जमीन जथा है, तुम हमरे इहां रहो और मेहनत करो उपजाओ, खाओ और हमरे इहां काम करो, फगुनी भीर गया टोकरी से 100 मीटर दूर नदी किनारे से माटी ला लाकर पूरे खेत को बगल अन्य खेत के समान 4 फीट भर के बना दिया, वही साईड मे एक घास फूस का कुटिया बनाया, दिने दुपहरिया उ खेत के एक कुदाल से कोर कार (जोत) एकदम खेत को सोना उगलने लायक बना दिया, उस साल मानसून भी समय से जमक के आया, एक कठ्ठा में 3 मन (40 किलो) धान हुआ, फगुनी महतो की तो बांछे खिल गई, दो तीन साल तक जम कर फगुनी ने हुमच के मेहनत किया, वो बंजर खेत जिसे अब फगुनी सोना उपजा रहा था, अवधेश के बाबूजी भी ई उपज देख के एकदम चोन्हिया रहे थे, 10-12 घंटे फगुनी को काम करना पड़ता। फिर अपने खेत में काम करना।
अब फगुनी का विवाह तय हुआ, दहेज में 2 बकरी जो 3-3 सेर दूध देती थी, एक लूंगी और एक कोठारी के गंजी दामाद को श्वसुर किशुनी महतो द्वारा दिया गया,
3 किलोमीटर दूर पास के केदारपुर गांव मे सुकुमार रमरतिया देवी, से फगुनी महतो को विवाह हो गया, लक्ष्मी रमरतिया के आते ही फगुनी का जीवन और सुखमय हो गया, गंगा-यमुना दोआब में लहलहाते फसल को देखकर किसान को जैसी खुशी होती है न बिल्कुल वैसी फीलिंग फगुनी महतो को रमरतिया को देखकर होती, इनका वैवाहिक जीवन आगे बढ़ा, 3 पुत्री और 2 पुत्र हुआ, सबसे बड़ा बिरजू था, और छोटा बैजनाथ, बड़का बेटा और तीनो बेटी का विवाह कर अब फगुनी ने सोचा कि अब बैजनथवा का बियाह कर दे, ससुरा का उमिर निकले जा रहा है, बैजनाथ सातवां क्लास तक पड़ोस गांव के स्कूल से पढ़ाई किया था, उसके दोस्त कई राजपूत, भूमिहार परिवार, ब्राम्हण परिवार के थे, दोस्तों के साथ मस्ती में लगा बैजू अब बाप का सहारा न बन के खुद को राजपूत, ब्राम्हण, परिवार के बच्चों की तरह सोचा करता था, उसे भी शौक था कि वे हीरो होंडा मोटर साईकिल पर अवधेश बाबू के बेटा की तरह घूमे, फगुनी महतो का शरीर अब काम नहीं कर पा रहा था, कभी काम करते करते चक्कर आ जाता तो कभी बीमारी की हालत में ही घर पर पड़ा रहता, बड़ा बेटा बिरजू अब अवधेश बाबू के यहां मजदूर थे, उसे भी केवल 2 किलो धान मिलता, मनमाफिक खेती न कर पाता वो, वो खेत वो खेत जिसे खुद फगुनी ने पिछले तीस साल से जोतकर खाद्यान उपजा रहा था, अब वो पुनः बंजर होते जा रहा था, लेकिन फगुनी का परिवार बढ़ते जा रहा था, एक झोपड़ी से अब आवश्यकता थी एक और घर की ताकि नई बहुरिया आ सके। अवधेश बाबू को उसके निठल्ले दोस्तों ने कान भरना शुरु किया कि अबे फगुनिया को उहां से भगाओ और हड़प लो, कौनो तुम्हरे बाबूजी कागज पतर थोड़ही दिए है, अवधेश को पता चला कि वो खेत मे नया घर बनाने वाला है, तीन चार लफूआ बोरो के साथ पहुंचा फगुनी के घर, गाली गलौज का सिलसिला चला, बात मार पीट पर आ गई, सब मिल के फगुनी महतो के पूरे परिवार को इतना पीटा की, फगुनी और उसकी पत्नी को पंद्रह दिन तक हरदी दूध पीना पड़ा था, फगुनी ठहरे सभ्य और शालीन, इस घटना पर सब को बुरा लगा, पंचायत बुलाई गई, मुखिया ने पूछा की फगुनिया तो फगुनिया ओकर मेहरारू, पतोहू सब काहे पीटे हो अवधेश बाबू उ त अहें के आदमी है, 20 साल से तोहरा ईहां काम कर रहे है, फ्री में, अब उ तुम्हरे बाबू जी तो उ जमीन उसको दे ही चुके है, अवधेश बोले की ऐ मुखिया जी जब लाठी चलती है न तो बस देहिया देखती है व्यक्ति नहीं, चाहे कोउ आबे, हम तो पीटेंगे ही, जल्दी से उ जमीनवा खाली कर दे, दू नाली निकाल के पंचायत सभा में ही आसमानी फायर कर दिए, पंचायत सभा भी डर के मारे स्थगित हो गया, अब जब मन होता अवधेश बाबू शाम को गांजा, दारू पीते और फगुनी के यहां हमला बोल देते, डेली धमकी देते की खाली करो, रोज का यही नाटक था, एक दिन बिरजू- पत्नी के साथ हीरो होंडा पर बैठ के आ रहा था, अवधेश गाड़ी रोकवा के गलियाना शुरू किया, अब भाई कितना सहेगा, प्रत्युतर में उ भी बोला की जवान संभाल के बतियाईए महराज, इतने पर सिंह जी ऐतना पिनपिनाए की पूछिए मत, शाम को फिर अपने गंजेरी दोस्तों के साथ टूट पड़े फगुनिया के इहां फिर से सपरिवार को कूट दिए. पंचायत बैठी, कहते है कि न्यायरूपी हिरोईन भी एकदम धाकड़ मजबूत मरद के साथ ही ब्याहना पसंद करती है, यथा- सलमान खान, विजय माल्या हो या फिर लालू जी, पंचायत भी अवधेश के ही पक्ष मे थी. अब रोज का यही धंधा था.
उस दिन खुद फगुनी महतो पियरका धोती पहिने गए अवधेश बाबु से माफी मांगे की मालिक अब झगड़ा झंझट ठीक न है हमर बचबा सब नासमझ है, हम अपन पूरा जिनगी खपा दिए रउआ के सेवा करते करते, अवधेश बाबू पिनपिना के गरियाए सो अलग तीन चार पियक्कड़ मिल के ऐतना पीटे की फगुनी hospital मे भर्ती हो गया, मुंगेरी कट्टा से दरवाज़ा पर आके असमानी फायर भी  किए, फगुनी ई सब बर्दाश्त न कर सका, बंदूक के आवाज सुनते हर्ट अटैक हुआ चल बसा, 1 महीना तक माहौल ठीक रहा, फेर एक दिन अवधेश बाबू अपने चिलम गैंग के साथ पहुंचे, सहते सहते थक चुका था, उड़ा देना चाहता था, अब ये शांति के कबूतर को बिरजू और बैजनाथ दूनो भाई और पड़ोसी मिल के सब के कंबल कुटाई किया, ले आया कहां न कहां से ई भी  दू गो मुंगेरी कट्टा और चढ के अब अवधेश बाबू के दुहारी पर Surgical strikes कर दिया, किया 5 आसमानी फायर, भागे अवधेश जी अपन चिलम छाप गैंग के साथ. फिर कभी लौट के जवाब देने भी न आए.

बिल्कुल यहीं फगुनिया और कमलेश बाबू वाला कहानी है, भारत-पाकिस्तान, इज़राइल-फिलिस्तीन हो या फिर ABVP-AISA का, जब मन करता था पाकिस्तान हमरा कान अईंठ के भाग जाता था, UNO रुपी पंच भी शुतुरमुर्ग की तरह माटी मे गर्दन गोंत लेता था,  पकड़ाने पर बोलता की ये Non state actors है, हम अपने परेशान है, उरी मे अटैक हुआ हमारे 17 जवान मरे, भारत सरकार ने सेना को छूट दी border cross कर surgical strikes किया गया, 8-10 terror launch पैड तबाह हुआ, 30-40 आतंकी को ठोका गया, Pakistan को इतना चोट पहुंचा की न उसे दिखाते बना न छुपाते, इज़राइल फिलीस्तीन का भी इहे झोल था, Arab के सारे देश मिल के तबाह तबाह किए हुआ था, Israel ने खुद को उस लायक बनाया है कि एक छोटा देश होते हुए भी अकेले पूरे अरब को हैंडल किए हुआ है.
अब आते है ABVP-AISA के थुथुरपन वाला झगड़ा पर, JNU हो या DU का रामजस कॉलेज, जब मन करता था, AISA बोलता था कि बस्तर, मणिपुर, कश्मीर मांगे आजादी, अफजल हम शर्मिंदा है तेरे कातिल जिंदा है, अब ABVP कह रही की जहाँ आजादी की बात करोगे वही कूटेंगे,
दरअसल लड़ाई है विचारधारा की वामपंथ और दक्षिणपंथ की, एक विचारधारा माओ वाली तो दूजा सावरकर वाली, अब वामपंथ की बात करें तो भारत मे अस्तित्व के लिए जूझ रहा है, और दक्षिणपंथ तो अभी policymaker है. वामपंथ Freedom of expression की बात करता है, लेकिन केवल खुद के ही Expression और दूसरा कोई जवाब दे तो वो झट से उसकी नजर में संघी हो जाता है, गलती केवल आईसा या फिर उसके मातृसंस्था लेफ्ट की ही नहीं है, झट से बिना सबूत के किसी पर देशद्रोही का टैग लगाने में दक्षिणपंथी संगठन भी कम नहीं है, अभिव्यक्ति की आजादी संविधान ने हमे दी है लेकिन इतनी तो नहीं की बस्तर की और कश्मीर की आजादी का नारा राजधानी मे बैठकर, लोगो के टैक्स से पढ कर लगाए. कुल मिलाकर निष्पक्षता से देखे तो छात्रों का इस्तेमाल दोनो विचारधाराओं द्वारा किया जा रहा है, विवेक अग्निहोत्री की एक बड़ी अच्छी मूवी है बुद्धा इन एट ट्रैफिक जाम, सनिमा देखतें है तो जरूर देखिएगा, सारा डाउटबा क्लीयर हो जाएगा।
खैर, समाज की बात करें तो हमारा समाज सहिष्णु है, गंगा जमुनी तहज़ीब को हम मानते है, मै मस्जिद मे जाता हूं तो मेरे कई मुस्लिम मित्र भी मंदिर मे जाते है, लेकिन ऐतना सुंदर माहौल मे जहर घोल कौन रहा है, ध्यान से देखे दूनू आंख चियार के तो दिखेगा की politicians दिखेगा, किसी को सत्ता चाहिए तो किसी को अस्तित्व मे बने रहने के लिए ऐतना नौटंकी आवश्यक है, लेकिन इसका फायदा हमारे दुश्मन अगर हमारी संप्रभुता, एकता अखंडता के ताने बाने को तोड़ने के लिए उठाए और बस्तर, कश्मीर और North east के 7 sisters state जैसे क्षेत्र के संवेदनशील माहौल का फायदा उठाने की कोशिश करें इससे पहले हमें देश के अंदर छुपे उन गद्दारो पर भी संविधान के दायरे में रहते हुए ही सही एक सर्जिकल स्ट्राइक्स की आवश्यकता है

  •  आनंद

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