फेसबुक का विष्लेषण

 

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मेरी भाषा में फेसबुक की परिभाषा सुनिए।

फेसबुक यानि चेहरे की किताब! वैसे तो चेहरा एक किताब माना गया है पर यहाँ की किताब थोड़ी अलग सी है।अलग माने इसमें भी खुद का कंट्रोल है जैसे की आप चाहे तो खुश दिखें, चाहे हो दुखी दिखे।लोग वही देखेंगे जो आप दिखाएंगे पर कुछ चतुर लोग वो भी देख लेते है जो आप नही दिखाना चाहते। जैसे की किसका किसके साथ चल रहा है ये फेसबुक ही बता देता है. फिर बातें किसी म्यूच्यूअल फ्रेंड के द्वारा आपकी मम्मी तक पहुँच जाती है।फिर आप कहते हैं उसी ने रिक्वेस्ट भेजी थी। मम्मी प्रोफाइल पिक दिखाने की ज़िद करती है और आप लजाते सकुचाते दिखा देते हैं।मम्मी खुश की बेटे ने सुन्दर लड़की चुनी, अब ये तो आपको ही पता है वो कितनी सुन्दर है। अब बेचारी मम्मी  को क्या पता की फेसबुक पर तो हर लड़की सुन्दर होती है।
आप बात करते हैं फेसबुक कनेक्शन की।
तो पहले किसी को फोन लगा कर खबर देनी होती थी अब बस एक स्टेटस डालना होता है और खुद ही फोन आने लगते हैं।
सबको सबकी खबर फेसबुक से और म्यूच्यूअल फ्रेंड्स से मिलती ही रहती है।और विशेष कंनेक्शन्स के लिए व्हाट्सअप तो है ही फिर फोन करने में पैसे क्यों खर्चना।
लोग घूमने गए तो फोटो डाल दी अब बाकी लोग जले या फूंके हमे क्या। कुछ खाया तो भी फोटो डाल दी, अब सबको खिलाने का ठेका हमने थोड़े न ले रखा है, हम तो बस शेयर कर रहे थे क्योंकि केअर करते हैं। किसी की शादी हो तो भले ही फ़ोटो देख देख कुंवारों के दिल पर सांप लोटते रहें वो तो तस्वीरें डालेगा ही, पचास हज़ार के लहंगे और छब्बीस हज़ार की शेरवानी से कमसे कम लाइक्स की सेंचुरी तो चाहिए ही।
परीक्षा में कम नंबर आये तो फेसबुक का दोष और कहीं गलती से ज्यादा आ गए तो फेसबुक पे स्टेटस अपडेट की मेहनत रंग लाइ, भले ही पिताजी के जूतों की वजह से आये हों।
अब बताइये अगर फेसबुक नही होता तो न सीतामढ़ी  कम्युनिटी और न ही हमारी अपनी वेबसाइट जिस से हम सब जुड़ गए हैं।अब अंत में यही कहूँगी की फेसबुक बनाने वाले मार्क भैया हमारी ज़िन्दगियों को अपडेटेड बनाने के लिए धन्यवाद!

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