बारिश, मिट्टी, पेड़ और हम।

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कभी बारिश में भीगे पेड़ों को देखा है?
बारिश के चले जाने के घंटों बाद भी भीगे रहते हैं, उस बारिश के एहसास को खुद में समेटे हुए। चुपचाप बारिश की यादों में खोये।
वहीं अगर मिट्टी को देखो तो कितनी बेताबी होती है उसमे, बारिश से मिलने के लिए।
सूखती है तड़पती है, फिर एक दिन फट जाती है। खुद में सुराख बना कर बारिश की बूंदों को न्योता देती हैं खुद में समा जाने का। पर बारिश कहाँ मानती है तड़पाती है तरसाती है और एक दिन जब उसका मन हो बरस जाती है। भिगो देती है पेड़ों को,मिटटी को। मिट्टी की ख़ुशी दिखती भी है और आसपास खुशबू भी फ़ैल जाती है जिस से हर किसी को खबर मिल जाती है की मिट्टी का बारिश से मिलन हो गया है। पर मिट्टी की ख़ुशी ज्यादा देर टिकती नही है, बारिश के निशान बड़ी जल्दी ख़त्म हो जाते हैं मिट्टी से क्योंकि हवाएं उसे सुखा देती हैं।

 

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ठीक ऐसा ही कुछ हमारे जीवन में भी होता है। शांति और संयम से इंतज़ार करो तो हर चीज़ अपने समय पर मिल ही जाती है, सिर्फ मिलना ही जरुरी नहीं उसे सहेज़ कर रखना भी पड़ता है जैसा पेड़ करते हैं। मिट्टी की तरह बाहें फैला कर इंतज़ार करने से सिर्फ बेचैनी बढ़ती है,कुछ हासिल नही होता। और कुछ मिलने पर अगर हर किसी को बताओ दिखाओ तो उस चीज़ को खोते देर नहीं लगती।

1 thought on “बारिश, मिट्टी, पेड़ और हम।

  1. Paani se tasvir kaha banti hai……
    Khwabo se takdir kaha banti hai…
    Kaisi ko chaho to sache dil se,
    Kyoki yeh zindagi phir se kaha milti hai, Sanjeet Kumar

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