बाल मज़दूरी

काश मेरा भी एक बचपन होता।

पढ़ने जाता मैं भी,खेलने का भी समय होता।

मेरे भी दोस्त होते तुम्हारी तरह।

मैं भी पढ़ने के बाद चैन से सोता।

 

काश कोई सुबह मुझे भी प्यार से जगाता।

गालियां कम पड़ती,मुझे भी कोई लोड़ीया सुनाता।

कोई तो मुझसे प्यार से बच्चों जैसी बातें करता।

काश मैं भी बैग लेकर स्कुल जाता।

तस्वीर खुद मैंने लिया है।
तस्वीर खुद मैंने लिया है।

घीस गए है हाथ मेरे थालियां साफ़ करते करते।

पत्थर से हो गए है दिल मेरे इन घावों को सहते सहते।

आदत सी हो गई है कानो को फटकार सुनने की।

खौफ सा पैदा हो गया है मन में मार पड़ने की।

 

इन सब से अब टूट चूका हु मैं।

न जाने दोष मैं किसको दूँ।

अपने पिछले जन्म के करम को या,

जनम से करम तय करने वाले इस ज़माने को…..।।।

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