बाहर रह कर भी बिहार से कभी अलग नही हो पाया।

Rajiv mishra, actor.
Rajiv mishra, actor.

मेरा जन्म बिहार के सीतामढ़ी में और लालन पालन तथा पढाई दिल्ली में हुयी। दिली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज कॉलेज से बी.कॉम की डिग्री ली, जबकि एशियाई अकादमी से फ़िल्म संपादन की पढाई पूरी की। पिता नंदकिशोर मिश्र किसान हैं, जबकि माता स्व. गोटा देवी गृहणी थी। बचपन से ही कला एवं कलात्मकता के प्रति बेहद आकर्षण तंग। लिहाजा मैंने शुरू से ही उसी दिशा में अपने आप को केंद्रित रखा। घर परिवार एवं समाज में तीज त्योहारों के बहाने बिहार आता जाता रहा। इसलिए बिहार से कभी अलग नही हो पाया, बल्कि जहाँ भी रहा अपने तरह का बिहार बनाये रखा। चाहे वह गीत-संगीत के माध्यम से हो या आस्था अनुष्ठान के माध्यम से।

मैंने टेलीविज़न के लिए कई यादगार कार्यक्रमों का निर्माण किआ। इसमें लोक गायक मनोज तिवारी द्वारा उद्घोषित सांस्कृतिक कार्यक्रम फोक जलवा, ऐतिहासिक कार्यक्रम सुनो पाटलिपुत्र क्या बोले बिहार, राजनितिक कार्यक्रम आमने सामने और आपराधिक कार्यक्रम दास्ताँ ए जुर्म आदि शामिल है। 2007 में मुम्बई पहुंच। मुम्बई में एक साल तक संघर्षमय जीवन रहा। उसी बिच भोजपुरी की पहली चैनल महुआ के लिए केबीसी (के बनी करोड़पति,भोजपुरी संस्करण) के लिए काम किआ। इस शो को होस्ट करते थे बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा। उसके बाद महुआ के लिए ही हास्य शो “वाह कवी जी” भी काफी लोकप्रिय रहा।

 

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बिग मैजिक में बतौर कार्यक्रम निर्माता ज्वाइन करने के बाद सबसे बड़ी चुनौती यह रही की बिहार झारखण्ड को परिभाषित कैसे करूँ? फिर यहाँ भी एक अलग धारा बनाई। बिहार-झारखण्ड के सकारात्मक पक्षों पर कार्यक्रम का निर्माण किआ। जैसे बिहार Kई धार्मिकता को उजागर करने के किये भक्ति सागर, राम चरित सुखदाई, भोजपुरी में महादेव ( हिंदी में यही महादेव लाइफ ओके पर प्रसारित), सामाजिक एवं राजनितिक भोजपुरी फिल्मो का नियमित प्रदर्शन, छठ, होली, दीपावली, हनुमान जयंती जैसे त्योहारों पर चर्चित लोक कलाकारों ( पद्मश्री शारदा सिन्हा, मालिनी अवस्थी, मनोज तिवारी, देवी) द्वारा विशेष कार्यक्रमों का प्रसारण शुरू करवाया। अभी अन्य कई कार्यक्रमों के निर्माण में जुटा हूँ।

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चैनल की व्यस्तताओं में  से समय निकालकर मैं चार भोजपुरी फिल्मों में बतौर नायक अभिनय कर चूका हूँ। साथ ही अब तक पंद्रह म्यूजिक एल्बम में गीत भी गया चूका हूँ। बिहार के युवा साथियों से कहना चाहूँगा की वे धैर्य के साथ संघर्ष करें, इसका प्रतिफल उन्हें सम्मान और पहचान दिलाएगा। लेकिन सबसे पहले खुद को पहचानना जरुरी है की आप जाना कहाँ चाहते हैं, इस बात का आत्म मूल्यांकन आवश्यक है।

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