महावीर बजरंगी के वे गुण जिन्हें हमें अपने जीवन में आत्मसात करना चाहिए

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महावीर हनुमानजी का ध्यान आते ही हमारे मन में एक बलशाली एकदमें 8 पैक ऐब्स वाले, गदा लिए पिक्चर सामने आने लगता है, इन्हें हम सबसे पराक्रमी देवता के रूप में मानते हैं, बचपन में दादाजी के सानिध्य में रहते रहते मुझे भी बजरंगी से लगाव हो चुका है, कक्षा 1 में थे तो टीचर को हनुमान चालीसा और बजरंग बाण सुनाए थे  पुरस्कार स्वरूप में 2 गो महालैक्टो चॉक्लेट और वहां मौजूद बुजुर्गों से ढेर सारा आशीष, अभी भी केतनो मौज मस्ती करलूं लेकिन जब भी टेंशन में होता हूं तो महावीर बजरंगी ही याद आते हैं , ऐसा नहीं है कि वो हेल्प करने स्वयं आ जाते हैं लेकिन अंदर से एक फीलिंग आ जाती है कि अबे और कोई नहीं तो अपना बजरंगी है न, आत्मबल का अभूतपूर्व अनुभव होने लगता हैं. ईश्वर/अल्लाह/भगवान पर विश्वास करना उनको पूजना किसी का व्यक्तिगत मामला हैं, सोच हमेशा वैज्ञानिक रखिए, लेकिन पत्थर में भगवान मानने का हमारा कल्चर है, Indus valley civilization से लेकर आज तक हम उसे फॉलो कर रहे हैं, हम उस कल्चर को इगनोर नहीं कर सकते, वो सिखाता है, हर जीव से प्रेम करना और प्रेम से ही सब कुछ संभव है, प्रेम लोगों को जोड़ता है, ईर्ष्या, घृणा तो दूरियां बढ़ाता हैं.
हमारे महावीर बजरंगी कई महान गुणों से परिपूर्ण थें, हम इनके कई गुणों का अनुशरण अपने जीवन में कर सकते हैं.
1. विनम्रता –
हम सबने केतना बार रामायण पढ़ा है,सुना है, देखा है, बजरंगी की ये खासियत हम सबको प्रभावित करती है, माता सीता को लंका से लाने के लिए जब हनुमान जी समुद्र लांघने की कोशिश कर रहे थे, तब उनका सामना ‘सुरसा’ नामक राक्षसी से हुआ, जो समुद्र के ऊपर से निकलने वाले को खा जाती थी, इन्हें देखकर सुरसा ने अपना मुंह और बड़ा कर दिया, हनुमान जी ने जब ‘सुरसा’ से बचने के लिए अपने शरीर का विस्तार करना शुरू कर दिया,  इस पर हनुमान जी ने स्वयं को छोटा कर दिया और सुरसा के पेट से होकर बाहर आ गए, बजरंगी चाहते तो दू चार गदा में सुरसा आंटी को सीधा कर देते,  लेकिन विनम्रता एवं बुद्धिमता का रास्ता अपनाया क्योंकि वे एक बड़े मिशन पर थे, हनुमान जी की इस विनम्रता से ‘सुरसा’ संतुष्ट हो गईं और उसने हनुमान जी को आगे बढ़ने दिया, अर्थात केवल बल से ही किसी को जीता नहीं जा सकता बल्कि ‘विनम्रता’ से भी कई काम आसानी से किये जा सकते हैं.

2. एक प्रखर नेतृत्वकर्ता –

काम कोई भी हो लीडरशीप मायने रखती है, देश तब भी चलता था जब मनमोहन सिंह जी थे, लेकिन मोदी जी के लीडरशीप में सभी मंत्रालयों में एक अलगे इनर्जी दौड़ गया है, कहते है कि लंका तक जाने के लिए भगवान राम की सेना को समुद्र पार करके जाना था. इसके लिए एक पुल बनाने की जरुरत थी. माना जाता है कि इस पुल को बनाने में हनुमान जी अपने नेतृत्व क्षमता का प्रयोग किया. चूंकि उनकी सेना में कमजोर और बलशाली दोनों प्रकार के लोग थे. ऐसे में उनके पास चुनौती थी कि वह किसको किस काम में लगायें. पर हनुमान जी ने अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता के बल पर सभी का उपयोग किया. उनका यह गुण हम सभी के लिए उपयोगी है. इस गुण के बिना किसी भी प्रकार के management की परिकल्पना करना बेकार है, उनके मैनेजमेंट का एक और Example है कि अशोक वाटिका में गाछी उछी उखाड़ के धरा गए, तो इनको जलाने का प्रयास किया गया, रावण के सारे कपड़ा लता पूंछ में बंधवा के आग लगवा के पूरे लंका का लंका लगा दिए, मतलब कपड़ा लता भी रावण का, घी भी रावण का, जलाने वाला प्रदेश भी रावण का, जलने के उपरांत प्रभावित भी रावण हुआ,  इससे बढिया मैनेजमेंट और का हो सकता है जी.

3. आदर्शवान महावीरा

हनुमान जी जब लंका में माता सीता से मिलने गये तो मिल तो लिए लेकिन लौटते वक्त अशोक वाटिका में गर्दा मचा दिए, रावण का डिफेंस सिस्टम धाकड़ था, रावण पहिले अपने कर्णल रैंक के ऑफिसर्स बिटवा अक्षय कुमार  को भेजा, कि जाओ बे हनुमान जी को पकड़ के लाओ, लेकिन बजरंगी तो दू चार गाछी उखाड़ कर उसके उपर पटक कर उनको सलट दिए, फिर बाद में मेघनाथ आया, मेघनाथ ने उन पर ‘ब्रह्मास्त्र’ का प्रयोग कर दिया था. ऐसे में हनुमान जी चाहते तो वह इसका जवाब दे सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. वह ब्रह्मास्त्र का महत्व कम नहीं करना चाहते थे. उन्होंने मेघनाथ के ब्रह्मास्त्र का सम्मान करते हुए उसको स्वीकार किया. हनुमान जी के इस फैसले से उनकी जान भी जा सकती थी, पर उन्होंने अपने आदर्शों से कोई समझौता नहीं किया. यह हमें सिखाता है कि हमें अपने उसूलों से, सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए.

4.  Communication skills

आज कम्यूनिकेशन स्कील्स बोले तो संवाद कुशलता बहुत आवश्यक है, केतनो बड़का ज्ञानी है आप, किसी को अपनी भाषा से प्रभावित न कर सकते तो उनके सामने में जीरो ही है, महाबली तो इस तकनीक के बिगबॉस थे, चाहे, सुग्रीव के पास रहे हों और जब श्रीराम और लक्षमण भटक रहे थे तो किष्किंधा पर्वत पर से देखने पर  सुग्रीव जी को लगा की शायद उनके बड़े भाई बालि ने उनके assassination (हत्या) के लिए किसी सीरियल किलर को सुपारी वगैरह तो नहीं दे दिया है, हनुमान जी को सुग्रीव ने भेजा, हनुमान जी गए और संवाद कुशलता के बल पर ही दोनो भाईयों को Convince किया और सुग्रीव और भगवान श्रीराम में दोस्ती करवाए रावण से युद्ध के दौरान सुग्रीव जी की वानर सेना बहुत उपयोगी सिद्ध हुई, या फिर एक और जिक्र, सीता जी से हनुमान पहली बार रावण की ‘अशोक वाटिका’ में मिले, तो माता सीता उनको नहीं पहचान सकीं. एक वानर से श्रीराम का समाचार सुन वे आशंकित भी हुईं, क्योंकि रावण की यह चाल भी हो सकती थी. ऐसी स्थिति में माता सीता को खुद पर भरोसा दिलाना उनके लिए कठिन था, लेकिन अपनी कुशल संवाद शैली के चलते हनुमान माता सीता को भरोसा दिलाने में सफल रहे कि वह भगवान राम के ही दूत हैं. उनका यह गुण हमें सिखाता है कि संवाद कुशलता कितना बड़ा गुण होता है.

5. वीरता

महाबली महारूद्रा महावीर के वीरता के किस्से तो किसी से छिपे नहीं है, सीता हरण के बाद जिस तरह से तमाम बाधाओं को पार करते हुए हनुमान जी श्रीलंका पहुंचे, वह वीरता का प्रतीक है. वह सिर्फ लंका ही नहीं पहुंचे, रावण के सोने की लंका को जला कर अपनी वीरता से अहंकारी रावण का मद भी चूर-चूर कर दिया, उनकी वीरता से प्रेरणा लेकर हमें वीर बनने की जरुरत है, ताकि आज के समय में तेजी से उभरने वाले रावण सरीखे अराजक तत्वों को समाप्त कर सके चाहे वो बाहर फैली टेररिज्जम हो या फिर आंतरिक टेररिज्जम.  रावण की सोने की लंका को जलाकर जब हनुमान जी दोबारा सीता जी से मिलने पहुंचे, तो सीता जी ने कहा पुत्र हमें यहां से ले चलो. इस पर हनुमान जी ने कहा कि माता मैं आपको यहां से ले चल सकता हूं. पर मैं नहीं चाहता कि मैं आपको रावण की तरह यहां से चोरी से ले जाऊं. रावण का वध करने के बाद ही प्रभु श्रीराम आदर सहित आपको ले जाएंगे. दुश्मन के घर में खड़े होकर इस तरह की बात करना हनुमान जी के अदम्य साहस को दर्शाता है. ऐसे साहस का संचार हमें अपने जीवन में भी करना चाहिए, ताकि हमें किसी भी परिस्थिति में कायरता से भरे रास्ते को न चुनना पड़े.

खैर, महावीर के केवल 5 गुणों की बात करना ये किसी के लिए बेवकूफी हो सकता है, क्योंकि मैं तो कोई बाबा या प्रकांड विद्वान टाईप नहीं बल्कि अज्ञानी हूं, मैं तो इता ही जानता हूं, इता ही सुना हूं, बुजुर्गों से अपने मित्रों से अपने अग्रजों से,  लेकिन उनका हर कार्य लेसन था, उनकी हर कहानी एक मिसाल है, वे गुणों के महासागर हैं, उनका हर कार्य हमें सीख दे जाता है, उन्हें केवल मंदिरों में या फिर What’s, Facebook पर चल रहे फोटों तक सीमित नहीं रखा जा सकता, पोंगा पंडितों या फिर पाखंडियों की बातों को मान कर या फिर भगवान से डर कर उन्हे पूजा नहीं किया जाना चाहिए, वो हमारे मित्र है, वो हमारे रक्षक है, वो हमारे मार्गदर्शक है, वो हमेशा ही हमारा हित चाहते है.

सुख लहै तुम्हारी सरना

तुम रक्षक काहू को डरना,  जय हो।

— आनंद

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