माँ मुझे जीना है…

20160822_190043आज घर के किसी कोने में अकेला उदास बैठा था वह पिता।
जिसने कभी पत्नी की कोख़ में जलाई थी अपनी बेटी की चिता।।

कल सिंधु और साक्षी के लिए वो भी ताली बजा रहा था।
पर हाथ कांप रहे थे उसके जैसे उसे कोई सजा सुना रहा था।।
सब खुश थे,जश्न मना रहे थे देश की बेटियों के जीत का।
परंतु ठिठुर गए थे पाँव उस पिता के,मौसम भी न था शीत का।।

आत्मग्लानि से उसका कलेजा भर चुका था,रोंगटे खड़े हो गए थे।
वह रात भर आसमां निहारता रहा,जब घर के सभी लोग सो रहे थे।।

कल शाम से वो किसी से बात भी नहीं कर रहा था,गुमशुम अकेला था।
शायद समझ नहीं पा रहा था क्यूं उसने लाड़ली को गर्भ से धकेला था।।

जीवन में पहली बार उसे शायद कल यह अहसास हुआ।
आँसू तो बाहर नहीं आने दिया,पर अंदर ही अंदर वह खूब रोया।।

उसे बहुत पछतावा हो रहा था क्यूं उसने अपनी बेटी को मार गिराया।
आखिर आज ये बेटियों ने ही तो देश को दो मैडल है दिलाया।।

बेटियों के प्रति आज उस पिता का नज़रिया बदल चुका है।
उम्मीद है उनके भी सोंच बदलेंगे जिनका अभी भी वहीं रुका है।।

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