मुझे जीने दो….मेरी दलाली नहीं करो।

बेच दिया था मुझे ज़िस्म के बाज़ार में।
कच्ची उम्र में मेरे बाप ने,चंद हज़ार में।
बाँध दिया था घुँघरू खेलने-कूदने की उम्र में।
बिठा दिया सजा-सँवार कर ग्राहक के इंतज़ार में।

मैं पांचवी पैदा हो गई थी बेटे की चाहत में।
मुँह तक न देखा था बाप ने मेरा, आहत में।
खाने के लिए था नहीं घर में,दहेज कहाँ से देता।
इसलिए बेच दिया मुझे कुछ पैसों की राहत में।

जब तक समझ में आया,मेरे साथ क्या हुआ था।
तब तक न जाने कितनों ने मुझे छुआ था।
अब तो ये दलदल मेरी आदत बन चुकी है।
पैदा लेते ही जो मैंने हारा था,वो क़िस्मत का जुआ था।

धंधेवाली,वेश्या और न जाने क्या क्या हमें बुलाते हैं।
फिर हमें ही क्यों अपनी बिस्तर पर सुलाते हैं।
जो दिन को शराफत का चोला पहन घूमते हैं।
रात को अक़्सर हमारे कोठे पर मिल जाते हैं।

हम भी इसी समाज के एक अंग है।
हमारे खून का भी तुम्हारे ही जैसा रंग है।
इस तथाकथित सभ्य समाज के लोगों ने ही हमें पाला है।
फिर क्यूँ हम इसी समाज के लिए एक कलंक है।

बंद करा दो ये सारा कारोबार अगर दम है।
बचा लो नन्ही बच्चियों को जिनके गुनहगार हम हैं।
कड़ी सज़ा दो उन्हें जो नन्ही कलियों की दलाली करते है।
मिले पूरा मान और सम्मान जिसके हक़दार हम है।

1 thought on “मुझे जीने दो….मेरी दलाली नहीं करो।

  1. बहुत सुन्दर ओमप्रकाश भईया लेख के माध्यम से आपने लोगो को जगाने की कोशिस कि है ,एक एक शब्द सोचने पर मजबुर करती है,बाक्ई बहुत सुन्दर लेख आपकी जितनी तारीफ कि जाए कम है

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