मैं धरती माँ बोल रही हूँ…..

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वृक्ष मेरे बेटे है मत काटो उनको

न जाने कितनो को तुम यूँ ही काट चुके।

तड़पते देख मेरे इन बेटों को

अब मेरी आँखों से आंसू भी हैं सूख चुके।

बेटे खोने का दर्द एक माँ ही समझ सकती है।

और कितना तड़पाओगे एक माँ को

मैं तो पहले से ही इतनी दर्द सह रही हूँ।

मैं धरती माँ बोल रही हूँ……

 

मेरी बेटी पानी का जितना तुमने दोहन किया

शायद ही किसी और का उतना किया होगा।

गंगा,यमुना,सरस्वती किसी को नहीं छोड़ा

और तो और जो मैं अपने कोंख से

जो तुम्हे पिलाती थी शुद्ध पानी

तुमने तो उसे गर्भ में ही मार दिया।

बेटे कोई मेरी आवाज़ नहीं सुन रहा

मैं तड़प तड़प कर कराह रही हूँ।

मैं धरती माँ बोल रही हूँ…..

 

अब इससे अधिक बोझ मैं नहीं सह सकती।

अपने बेटे-बेटी के बिना मैं भी नहीं रह सकती।

आखिर तुम सब भी तो मेरे ही संतान हो

माँ तड़प रही है और तुम अंजान हो।

बचा लो मुझे अब भी वक़्त है।

नहीं तो बर्बाद हो जाउंगी मैं।

हाथ जोड़ कर मैं तुमसे विनती कर रही हूँ

मैं….. मैं धरती माँ बोल रही हूँ…..!!!!!

 

 

 

1 thought on “मैं धरती माँ बोल रही हूँ…..

  1. बहुत ही खूबसूरत और आँखें खोलने वाली कविता।

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