लघुकथा


सुरभि बड़ी देर से नरगिस के फूलों को देख रही
थी| और चन्दन उसे एकटक निहारे जा रहा था| फिर अचानक सुरभि ने पूछा- चन्दन,
क्या तुमने कभी फूलों को बात करते सुना है? चन्दन हंस कर बोला- नहीं तो| मुझे तुम्हारी बातें सुन ने से फुरसत कहाँ है
सुरभि| मैं क्या इतना ज्यादा बोलती हूँ?-सुरभि मुंह बना कर बोली| चन्दन
बोला-अरे नहीं रे पगली मेरा वो मतलब थोड़े था| पर तुमने ये फूलों
को बातें करते कब सुन लिया? फिल्मो में देखा है मैंने, वो दिखाते हैं न फूल
एक दूसरे की तरफ मुँह कर के हिलते हुए- सुरभि बोली|
चन्दन ने सुरभि का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा- मेरी प्यारी सुरभि
फिल्मों की दुनिया से बाहर निकलो और बताओ मैं तुम्हारे पिताजी से
शादी की बात करने कब आऊं?

सुरभि ने तुरंत उसका हाथ झटका और उठ कर खड़ी हो
गयी| और बोली-तुम्हारा दिमाग तो ठिकाने है? मैं तुम जैसे बेरोजगार लड़के
से शादी करूंगी? तुम्हारे पास है ही क्या मुझे देने के लिए? एक सालमें एक ढंग के रेस्टोरेंट तो ले नहीं गए मुझे और शादी के
सपने देख रहे हो?चन्दन सहम गया- सुरभि ऐसा मत कहो, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ|
और नौकरी भी मैं जल्द ही ढूंढ लूँगा| सुरभिबोली-फ़िल्मीदुनिया से बाहर निकलो चन्दन, ये प्यार मोहब्बत फिल्मों में हीअच्छे लगते हैं|दुनिया पैसों से चलती है, मैं तुमसे शादी कर के अपनी ज़िन्दगी बरबाद नहीं कर सकती| मेरे पापा ने मेरे लिए एक डॉक्टर लड़का ढूँढा है, अगले हफ्ते वो मुझे देखने आ रहा है| मैं चलती हूँ मुझे पार्लर जाना है,और आज के बाद तुम मुझसे न ही मिलो तो बेहतर होगा| सुरभि चली गयी| चन्दन भी भारी क़दमों से अपने घर की और चल दिया | उसने सोचा ठीक ही तो कहा सुरभि ने फिल्मी दुनिया में तो वो जी रहा था,सुरभि नहीं|
-प्रीति पराशर

सर्वप्रथम The anonymous writer हिंदी फेसबुक पेज पर प्रकाशित

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