शादीशुदा जोड़े का बैचलरहुड भाग तीन : व्हेन गुड डेज़ आर ओवर

तो आखिरकार वो दिन आ ही गया जब मैडम जी अपना तमाम ताम झाम लेकर नेताजी के ठिकाने पर आ पहुँची। नेताजी को काटो तो खून नहीं, अब कहाँ से आएंगे वो आलस भरे दिन और वो दोस्तों यारों की महफ़िल वाली रातें। लाख प्रयासों के बाद भी घर को बेसलीका रखने के लिए मैडम जी की फटकार सुननी ही पड़ी, अपने दिल पर पत्थर रख कर सभी कपड़ों को तह करना पड़ा। ऐसे वक़्त में नेताजी को वो दिन याद आते जब बिस्तर से लेकर खूँटी तक उनके कपडे फैले होते थे, माहौल बना रहता था। पानी भी पीना हो तो मजाल है जो कुर्सी से उठ जायें , चेले चपाटे आखिर किस दिन के लिए थे। सुबह चिकन , दोपहर अंडा और रातें मटन हुआ करती थीं अब आये थे पालक और लौकी करेले वाले दिन, मैडम हेल्थ कौनशियस भी और शाकाहारी भी।

खैर ये सब तो छोटे छोटे दुःख थे, असली दुःख तो ये था की अब हर दिन नहाना पड़ता था, गर्मियों में तो ठीक था पर जाड़ों में भी? ऐसा अत्याचार सह कर नेताजी किसी पुरुष आयोग को गूगलाने लगते। दूध लाना, सब्जी लाना ,राशन लाना, मैडम को मार्किट ले जाना ऐसा पहाड़ सरीखे काम थे जिनसे नेताजी का ज़िन्दगी में पहली बार वास्ता पड रहा था। इतने दिनों की आरामतलबी से जो तोंद की जो फसल उगाई थी मैडम जी उसके पीछे हाथ धो कर पड गयीं। भगवान् की दया से खाने में तो कटौती नहीं की पर रोज़ सुबह सुबह व्यायाम कराने लगी। अब आठ बजे उठने वाले प्राणी को अगर रोज़ सुबह ५ बजे कोई जगा दे तो उस से बड़ा कष्ट जीवन में हो सकता है क्या?

अब दोस्तों का भी दर्द सुनिए, अपने जिगरी दोस्त के घर आने के लिए भी अपॉइंटमेंट लेना पड़ता। नेताजी भी माहौल देख कर जवाब देते, माहौल गर्म होता तो दोस्तों को संकेत दे देते आज घर आना खतरे से खाली नहीं। घर आना तो छोडिये देर रात को फ़ोन करने में भी सोचना पड़ता था क्यंकि रात १० बजे के बाद अगर नेताजी का व्हासएप्प भी टुनटुना गया तो मैडम जी के कान खड़े हो जाते ।और नेताजी के सामने दुविधा खड़ी हो जाती की मेसेज पढ़े की न पढ़े क्यूंकि अगर किसी महिला मित्र का मेसेज निकला तो इतनी रात को जायेंगे कहाँ। और अगर किसी दोस्त यार का मेसेज हुआ तो रिप्लाई न करने के लिए गालियाँ अलग से पड़ेंगी, अब उन कुंवारों को क्या पता शादीशुदा मर्द का दर्द। अंत में उपाय यही दीखता की बाथरूम में जाकर मेसेज पढ़ा जाये पर आफत यह भी थी की अगर मैडम ने फ़ोन लेकर बाथरूम जाते देख लिया तो उनके शक का कीड़ा पता नहीं कितना विकराल हो जायेगा।

इधर  मैडम की भी हालत कुछ ख़ास अच्छी नहीं थी, कहाँ वो अकेलेपन का सुख और कहाँ ये घर गृहस्थी का दुःख। अब खाने में मैगी या पोहा नहीं बना सकती थी, अब तो हर दिन भारतीय थाली का हर आइटम कम्पलसरी था। घर के सारे कम उन अकेले के जिम्मे, नेताजी मदद तो करते नहीं उल्टा काम बढाने को तैयार रहते। नेताजी की अनहाईजिनिक आदतों से मैडम का खुल अलग जलता रहता। कभी जूते पहन कर बाथरूम में अपने पदचिन्ह छोड़ देते तो कभी धुलने के लये रखे कपड़ों में से शर्ट निकाल कर पहन लेते।

ऐसे ही हँसते मुस्कुराते, रोते गाते , लड़ते झगड़ते गृहस्थी की गाडी चल पड़ी थी। घर में बर्तन होंगे तो बजेंगे ही। फुर्सत में जब बैचलरहुड वाले दिन याद करते तो दोनों यही कहते “हमारा बैचलरहुड ही ठीक था”।

इस कड़ी के पहले और दुसरे भाग को आप यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकते हैं :भाग एकभाग दो

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