सावन भी हार जाए इन आंसुओं से (कहानी) – आनंद

 

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ड्यूक टीशर्ट, कैंपस वाला ऩएका जूता और कंधे पर टायकून का बैग लादके माधव बाईपास बस स्टैंड पहुंचा है, घर की स्मृतियां भूला नहीं पा रहा। घर से निकलते वक्त मम्मी दही-चीनी चटाई थी और पापा से छिपा कर जेब में जबरदस्ती 500 का एक नोट घुसेड़ दी थी, तुड़ा मुड़ा 500 का नोट देख के आंखे नम हो रही, अब आंसू निकलने को ही थे कि पीछे से बस कंडेक्टर गमछा फहराते हुए आवाज लगाया है, केवल पटना, पटना-हाजीपुर वाले ही इस बस में चहड़िए,

रे फेकना खलसिया, सरवा तू डीवीडी लगा, जल्दी बाहर आ डिकी खोल ही न रे, पैसेंजर सामान लिए इधर-उधर बउआ रहा है, अउर तू साला के भतार टीवीए में घूसल रहेगा. तभी कंडक्टर की नजर सामने कंधे पर पर बैग और कान में सैमसंग का हेडफोन घुसेड़े पास आरही मोहतरमा की ओर गई है। हां मैडम कहां जाईएगा, पटना की हाजीपुर, डाईरेक्ट सेवा है. मोहतरमा ने बीच में मिसरी घोलल शब्दों में बोलना शुरू किया है, नहीं भईया, आपलोग हमेशा झूठ बोलते है, बोलते है पटना जाएंगे और रास्ता में उतार के बस चेंज करवा देतें है. कंडक्टर साहेब ने अपने अनुभव और योग्यता का बखान करते हुए अपना परिचय दे डाला है, मैडम नाम लिख लीजिए जटेसर सिंह, सैदपुर घर है, 7 भाई है, सातों 20 साल से बस में कंडेक्टरी कर रहें है, साला आजतक कोई उंगली नहीं उठाया है, एतना बायो सुनते ही मोहतरमा कनविंस होकर बस में चढ़ गई है।

माधव भी किन्ले पानी बोतल, दो कुरकुरे और गोल्डफ्लेक सुलगाए बस में चढ़ा है, सामने वाले सीट पर भगवा गमछा रखा हुआ है, थोड़ा आगे बढ़ने पर नाक पर चश्मा सरकाए एक चचा China जैसे दक्षिण चीन सागर पर कब्जा करते हुए पूरे पसर के बैठे हुए है, माधव आगे बढ़ता जा रहा है, टीन, डोलची और डालडा के डिब्बों को लांघता हुआ, आखिरी से चौथे नंबर की सीट खाली दिखा है, वो मोहतरमा खिड़की की ओर गर्दन घुमाए, विभिन्न दृश्यों का अवलोकन कर रही है, उपयुक्त स्थान देखकर माधव बैग उपर घुसेड़ते हुए बैठा ही था कि बस में लगी टीवी पर अजय देवगन जी की विजयपथ मूवी चलना शुरू हुआ, सिगरेट के दो-तीन कश अब भी बचे हुए है, बैठते ही मोहतरमा बोल पड़ी, कृपया सिगरेट का ये धुआं उधर ही फेंकिए. मुझे ये धुंआ पसंद नहीं. माधव अपनी ओर अचानक से आए इस य़ार्कर पर डिफेंसिव मुद्रा में आकर, सिगरेट को हाथ से ही बुझाने का प्रयास कर रहा है,

मोहतरमा बोल पड़ी – अरे नहीं-नहीं चंद्रशेखर आजाद मत बनिए, हाथ जल जाएगा. माधव ने भी मोर्चा संभाला – क्या करें, सामने वाले का भी तो ख्याल रखना पड़ता है, आप थोड़ा साईड हो जाईए में इसे खिड़की से फेंक देता हूं. सिगरेट फेंकने के पश्चात, माधव बोल पड़ा- आप पटना जा रहीं है, नहीं ये बस तो कैलिफोर्निया जा रही है, जब बस पटना के लिए है, तो पटना ही जाएंगे न. मोहतरमा पंच दागते हुए बोली. दोनो हंस पड़े.

बस रफ्तार में, कंडक्टर पैसेंजरों को ठूंसता चला जा रहा था, खलासी पान खा-खाकर पान का ललिहट शर्ट के कॉलर पर बिखेर रहा था, उधर अजय देवगन जी आंख में चश्मा डाले रात के अंधेरे में तब्बू की इज्जत बचाने के लिए गुंडों पर मार्शल आर्ट्स का प्रयोग कर, फ्लाईंग किक मार मार के सलटा रहे थे. अचानक से बस रूकी, रूकते ही फ्रूटी और पानी बेचने वाला बस में चढ़ा, मोहतरमा कान से हेडफोन निकालती हुई बोल पड़ी, भईया एक पानी बोतल देना, पानी वाले ने बोतल बढ़ाते हुए रू मांगा है, 20 रूपया लगेगा मैडम, बीस कैसे भईया, 15 रूपया प्रिंटेड है-20 कैसे दे, अरे लेबे के है त लीजिए ज्यादा अंग्रेजी न झाड़िए. बगल वाले चाचा भी बैठे-बैठे बोल पड़े – अरे हिसाब से बोलो, एक महिला से कैसे बिहेव किया जाता है ये तमीज नहीं है रे. इतना सुनते ही मोहतरमा ने भृकुटी तान ली, हेलो अंकल, हेलो, क्या महिला है, मैं अपनी लड़ाई खुद लड़ लूंगी, आप चुपचाप बैठिए, निकल पड़े वीमेन इंपावरमेंट करने, 5000 सालों से महिलाओं का शोषण इसी प्रकार से कर रहें है, ये मानसिकता है आप पुरूष जात की, आप ये सोचते हैं कि हम अपनी लड़ाई नहीं लड़ सकेंगे. आज हम आपसे किस क्षेत्र में कम है, देश को आज हर क्षेत्र में रिपरजेंट कर रही है और आप चले हैं. सहानुभूति जताने…

पानी बेचने वाले का तो छोड़िए आधा बस तो मोहतरमा की ओजस्वी छवि देखकर आश्चर्य व्यक्त कर रहा था, पानी वाला लईका सकपकाया, कंडक्टर नें डांटते हुए लड़के को उतारा, मैडम को पानी मिले-न-मिले पूरे बस में फेमिनिज्म के विचार गंध मारते हुए विचरण कर रहे थे. माहौल शांत होते ही परिचय देते हुए बोल पड़ा, मेरा नाम माधव है, पटना जा रहें है, पटना यूनिवर्सिटी से PG कर रहें है, मुसल्लह पुर हाट के पास रहते है, और आप, खैर छोड़िए, आप तो झांसी की रानी से तनिको कम नहीं है. आधुनिक झांसी की रानी, मेरे पास दो पानी की बोतलें है अगर आप बुरा न माने तो मै ये आपको प्रिंटेड दर 15 रूपया में ही दे देता हूं, वैसे आज तक कभी मैने पानी बेचा नहीं है. लेकिन आप चाहे तो, परंतु ये विनती है कि पीने के पश्चात कुछ शेष बचे तो मुझे आप दे देना, इतना सुनते ही वो हंसने लगी. उसने भी अपना परिचय दिया है, रिया, पटना यूनिवर्सटी से तो मैं भी पी.जी कर रही हूं, लेकिन रहती कहां हूं, ये नहीं बताने वाली. क्योंकि पिछले हफ्ते ही मेरे हॉस्टल के बाहर से दो रोड छाप आशिकों को मनु महराज पीटते हुए ले गये है. दोनों के चेहरें पर हल्की मुस्कान उत्पन हुई, पानी डिप्लोमेसी से बात आगे बढ़ी, बस फिर से रफ्तार पकड़ चुका, शामतक पटना पहुंचना हुआ, गायघाट पुल पर बस रूका, दोनो उतरे और ऑटो पकड़कर अनजान बनते हुए गंतव्य की ओर चल पड़े.

उस शनिवार माधव खुदाबख्स लाईब्रेरी में बैठा पढ़ रहा था, तब अचानक से सामने से वो आती दिखी. किताब छोड़कर माधव बाहर निकला, वो बोल पड़ी अरे वाह आज तो अफ्सपा की समस्या के बारे में पढ़ रहें है, कश्मीर से अफ्सपा हटवाईएगा क्या माधवजी, आप यहां, हां मैं भी यहीं पढने आती हूं, इसका मतलब ये नहीं कि आप मेरा पीछा करते-करते मेरे हॉस्टल तक पहुंच जाईएगा, मनु महराज कूटते-कूटते ले जाएंगे और आपकी कूटाई होगी ये तो अच्छी बात नहीं है न, फिर दोनों हंस पड़े। माधव चाय का ऑफर देते हुए बोल पड़ा है, फुरसत में है तो आईए चाय पीते है, यहां एक चाय वाला है, बहुत अच्छा बनाता है. एकदमें खांटी दूध का. चाय के बाद कुछ समय तक साथ लाईब्रेरी में समय बिताने के पश्चात दोनो चले गए.

कालेज के बाद अब हर शनिवार और रविवार को दोनों लाईब्रेरी में मिलते, पढ़ने के पश्चात एन.आई.टी घाट पहुंच गंगा आरती के बाद भी चबूतरों पर बैठे रहते, ढेरों बाते होती, कभी पढ़ाई की, तो कभी देश दुनिया की, समय बीता, दोस्ती प्रेम का रुप धारण कर रही थी. धीरे-धीरे प्रेम का भी परवान चढ़ा. साथ आना-साथ जाना. कभी प्यार कभी तकरार. प्रेम प्रगाढ होता गया. एक दूसरे को पूरक हो गए.

दो वर्ष चुके थे, पिछले कुछ दिनों से रिया उदास प्रतीत होती थी, लेकिन चेहरे पर मुस्कान लिए अपने गमों को छुपा रही थी, माधव उसे नोटिस नहीं कर पा रहा था, उस रविवार भी रिया लाईब्रेरी में आई नहीं, माधव चिंतित हो, फोन कर रहा था, फोन बिजी आ रहा था, आज लाईब्रेरी में माधव का भी मन नही लगा, किताब बैग में डाल, एनआईटी घाट पहुंचा, वो पहले से हीं वहां बैठी हुई थी, सफेद सूट और काले दुपट्टे में वो बहुत खूबसूरत रही थी, गंगा की छोटी लहरों और नमीयुक्त हवाओं के वेग से बालों की लटें गालों को छूकर कभी दूर तो कभी पास आ रहा था, भौंहों के इंद्रधनुष के बीच में वो छोटी सी सूर्य समान बिंदी चेहरे की रौनक और बढा रही थी, हल्की मुस्कान, सादगी भरा चेहरा और हाथों में नोट्स लिए चबूतरे पर बैठी गंगा की ओर देख रही थी.
माधव हल्का गुस्साते हुए बोला – अच्छा तो आप यहाँ, दूर से ही नौकाविहार का आनंद ले रही है. कल से फोनवा बिजी है, लेकिन हाथ में नोट्स वाह, विदूषी बनना छोड़िए. पास बैठते हुए हाथों को अपने हाथ में लेकर बोल पड़ा – इन किताबों के बाहर भी बड़ी दुनिया है, प्रेम की दुनिया है, मौसम सुहावना है, हम सप्ताह में मात्र दो दिन मिलें और वहां चर्चा करें भी तो सिलेबस, और उदास क्यूं हो, किस गूढ विषय पर रिसर्च कर रही है, मिसेज माधव? वो बस शांत बैठी सुने जा रही थी. अच्छा छोड़िए नहीं बताना है, खैर पिछले हफ्ते आपके पिताजी आए थे न, क्या आपने अपने पिताजी से मेरे बारे में बात किया है, या फिर मुझे आपकी शादी में बारातियों को खिलाने के लिए पूरी, पत्तल और पानी ही चलाना है।
चुप्पी तोड़ते हुए रिया धीमे स्वर मे बोल पड़ी हां – मैने पिताजी से आपके बारे में बात की थी, हमने ये भी कहा कि – वी लव इच अदर. वो मुझे खुश रखेगा. यू.पी.एस.सी की तैयारी कर रहा है. अपने ही जिला का है. माधव पास घिसक कर उत्सुक होकर बोला पड़ा- फिर- फिर तो राजाजी की बैंड बचेगी.

रिया आंखों में आंसू लिए बोल पड़ी – मां की मृत्यु के पश्चात पापा ने मुझे किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी, हर कदम पर साथ दिया है, उनका कहना है कि हम अपने समाज से आगे नहीं जा सकते, दूसरी कम्यूनिटी अर्थात एक राजपूत से हम ब्राम्हण का विवाह कैसे संभव है. और अभी पढ़ ही तो रहा है, है तो अभी बेरोजगार ही न, यूपीएससी की क्या मारामारी है सबको पता है, आज तक हमने आपकी सभी बात मानी है आप मेरी बात मानिए- अपनी ही कास्ट का एक लड़का है, पीएनबी में बैंक क्लर्क है, कमसेकम नौकरी तो है न, परिवार भी संपन्न है, फिर हम जाति से आगे नहीं जा सकते. समाज को जवाब मुझे देना है.

माधव को श़ाॅक लगा, दूर हटते हूए माधव बैठ गया है, आवाक हो पूरब की ओर मुंह घुमाए, गांधी सेतु पुल की ओर शांत होकर बस देख रहा है, रिया भी आंखों में आंसू लिए नदी के पश्चिमी छोर की ओर देखने रही है. आधे घंटे हो गए, आज इंद्रदेव भी बारिश की फुहारों से शायद दोनों को मनाने की कोशिश कर रहें है, वायुदेव भी हवा में नमी घोलकर, हाजीपुर-सोनपुर इंड्स हौले-हौले ला रहे है, अंततः रिया उठी और पीछे की ओर आईसक्रीम बेच रहे वेंडर से दो आईसक्रीम खरीद लाई और बोल पड़ी इसको पकड़िए और बिना खाए हाथ में लेकर बैठिए, कुछ देर के पश्चात आप चाहो न चाहो ये अपने आप पिघल जाएगा. ये बर्फ अपनी अवस्था में परिवर्तन नहीं चाहता है लेकिन प्रकृति ने उसके सामने ऐसी परिस्थितियां उत्पन की है जिससे अवस्था परिवर्तन अवश्यंभावी है . इसमें आपका कोई रोल नहीं, मेरा कोई रोल नहीं. यहीं हाल मेरा है, मै चाहूं न चाहूं मुझे परिवार के निर्णयों के साथ चलना है, मां की मृत्यु के पश्चात पिताजी ने मेरी खुशी के लिए सब कुछ त्याग दिया है, मुझे उनके निर्णयों पर आगे बढ़ना है. आंखों से आंसू गिरने लगे, माधव बस शांत होकर अचानक से उठा और चल पड़ा, वो सामने गंगा की धारा को देर तक देखती रही.

1 वर्ष बाद माधव अब दिल्ली में है, किताबों के बोझ तेल आज भी दबा है, आज अचानक से फेसबुक मैसेंजर पर मैसेज आया है, पानी की बोतल का इमेज देखकर माधव का मन कौंधा है, टेक्स्ट मैंसेज में लिखा है पहली बार जब तुमसे मिली थी, तो तुमने पानी का बोतल दिया था और हां आज भी मैं बोतल से मुंह लगाकर ही पीती हूं, शायद ये आदत मेरी ना सुधरे, आखिरी बार जब हम मिले थे, तुम तो बिना पीछे मुड़े मुझे अपने हाल पर छोड़कर आगे बढ़ चुके थे, मैं शायद ये सोच रही थी कि काश तुम मुझे संभालों. खैर, आज मेरी शादी है, सहेलिया बता रही है कि बहुत सुंदर लग रही हूं, बारात दरवाजे पर आ चुकी, पूरा परिवार जश्न मना रहा, तुम मानो न मानो तो मै तुम्हें मिस कर रही हूं. और मैं इस काबिल भी नहीं की तुमसे माफी मांग सकूं, लेकिन ये एहसास शायद जीवन भर रहेगा कि किसी को मैने खोया है. सैकड़ों की भीड़ में मेट्रों में खड़ा मैसेज पढ़ रहा माधव अकेला महसूस कर रहा है, आंसू टपके जा रहे, मोबाइल डिस्पले भी आंसूओं से भीग चुके है, सावन भी हार जाए इन आंसुओं से.

© आनंद कुमार,
सीतामढ़ी

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