सीतामढ़ी के अगले सांसद।

लोक सभा चुनाव 2019 से पुर्व सीतामढ़ी लोक सभा क्षेत्र के संभावित उम्मीदवारों की बेबाक समीक्षा।

2019 के लोक सभा चुनाव में मात्र 3 महीने रह गए हैं। सभी राजनैतिक दल में सरगर्मियां बढ़ गई हैं। अन्दर हीं अन्दर सभी पार्टियां सभी क्षेत्रों से अपने अपने उम्मीदवारों के लिए मंथन कर रही हैं। सभी उम्मीदवार भी लगे हैं अपने अपने तरीके से पार्टी और जनता में अपनी पकड़ मज़बूत करने में। ऐसे में माता सीता की धरती सीतामढ़ी लोक सभा क्षेत्र का चुनावी गणित इस बार बहुत ही उलझता नज़र आ रहा है।

यदि हम बात करते हैं वर्तमान सांसद राम कुमार शर्मा की जो उपेन्द्र कुशवाहा के राष्ट्रीय लोक समता पार्टी से हैं और आज कल वो पुरे क्षेत्र में लोक नींदा का विषय बने हुए हैं। वो पिछले आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के पक्ष में चली आंधी में उड़ते हुए सीतामढ़ी से सीधा संसद तक पहुँच गए। लेकिन उनके अब तक के कार्यकाल में उनकी गतिविधि को देखते हुए जनता इसी उलझन में है की वो सांसद हैं भी या नहीं। अब पूरे क्षेत्र में हालत यह है की यदि वो दोबारा उम्मीदवार बनाए जाते हैं तो अपनी सहयोगी पार्टियों का ज़ोरदार विरोध झेलना पड़ेगा और वो जैसे उड़ते हुए संसद पहुँच गए थे, इस बार पूरी जनता जो की उन्हें ले कर ज़बरदस्त आक्रोश में हैं, उन्हें सीतामढ़ी से उड़ा कर ही दम लेगी। रालोसपा तो अब NDA के नाव से उतर हीं चुकी है इसलिए संभव है कि पुरानी शैली के अनुसार यह सीट हीं जनता दल यूनाइटेड के जिम्मे सौंप देगी। वैसे भी 2009 के आम चुनावों में यह सीट जदयू के पास हीं थी।

अब यदि हम महागठबंधन की बात करें तो उधर सीताराम यादव का नाम सब से ऊपर आता है और जिन्हें तेजस्वी यादव का साथ तो है हीं, साथ में लालू प्रसाद का आशीर्वाद भी प्राप्त है। उनका लम्बा चौड़ा राजनैतिक अनुभव भी उनके साथ है। पंचायत से ले कर विधान सभा, लोक सभा और राज्य सरकार में मंत्रालय तक का अनुभव समेटे सीताराम यादव तो पार्टी की एक पसंद हैं हीं। पिछले विधान सभा चुनाव में उम्मीदवारी को लेकर पारिवारिक कलह सामाजिक हो चला था।

पर यहाँ मामला फंसता दिख रहा है अर्जुन राय को ले कर, जो की एक और प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। ये पहले एन डी ए में जदयू से सांसद रह चुके हैं पर अब वो बागी तेवर के साथ नितीश कुमार की खिलाफत मोल ले कर शरद यादव गुट में आ गए हैं और उनकी लोकतांत्रिक जनता दल के एक प्रमुख ध्वजवाहक हैं। पिछला चुनाव उन्होंने जनता दल यु से लड़ा था पर उन्हें मुह की खानी पड़ी थी और मात्र 97,000 वोट हीं ला पाए थे। एन डी ए से लड़ने में वो 2009 के आम चुनावों में जहाँ जदयू से हीं 2 लाख 33 हजार वोट ला कर जीते थे वहीँ इस बार अलग हो कर उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा है। अब शरद यादव इनके लिए महागठबंधन से सीतामढ़ी की सीट की उम्मीद तो लगाए हुए हैं पर राजद किसी हाल में सीतामढ़ी लोक सभा सीट नहीं छोड़ना चाहेगी। क्योंकि हम यदि उत्तर बिहार की सीटों पर एक नज़र डालें तो मुज़फ्फरपुर, दरभंगा, मोतिहारी, शिवहर, और सीतामढ़ी में एक मात्र सीट सीतामढ़ी हीं है जो यादवों केलिए अनुकूल है और आप इतनी भारी संख्या होने के बाद उनसे ये हक नहीं छीन सकते। ऐसे में माना यह भी जा रहा है की यदि बात नहीं बनती है तो राजद शरद यादव जी का कहना मान कर अर्जुन राय जी को इस चुनावी रास्ते पर चलने का मौका देगी लेकिन लालटेन की रोशनी के सहारे। यानी कि उन्हें शरद यादव जी का साथ छोड़ कर राजद का दामन थामना होगा। पर दूसरी ओर अपने लिए महागठबंधन से शरद यादव को मधेपुरा सीट तो मिल ही जायेगी तो संभव है की वो इतने में ही मान भी जाएँ। सीतामढ़ी की जनता अर्जुन राय के कार्यकाल को अच्छा मानती है।

हाल के दिनों में बिहार की राजनीति में एक नया चमकता हुआ सितारा रितु जयसवाल के रूप में उभर कर सामने आया है। ये सीतामढी के हीं सोनबरसा प्रखंड के सिंहवाहिनी पंचायत की मुखिया हैं। मुखिया बनते हीं काफी चर्चा में आई थीं। इनके पति भारतीय प्रशासनिक सेवा (एलायड) के एक वरिष्ठ अधिकारी थे। और उतने ऊँचे स्तर से बिल्कुल हीं जमीन पर अपने गाँव की मुखिया बनीं तो चर्चा होना तो लाज़मी था। मुखिया बनते हीं कम समय में इन्होंने विकास की जो अमिट छाप छोड़ी और जनता के दिलों में उम्मीद की एक नई किरण जगाईं उससे सीतामढ़ी के ही नहीं, पूरे प्रदेश और देश के लोगों और राजनैतिक पार्टियों की नज़र इन पर पड़ने लगी है। जात पात ऊंच नीच से ऊपर उठ कर इन्होंने जो कार्य किया है उससे इन्होंने राजनीति को एक नई परिभाषा दी है। जनता इन्हें सकारात्मक राजनीति के एक प्रतीक के रूप में देखती है जो आरोप प्रत्यारोप की राजनीति से कोसों दूर हैं, तो वहीं कुछ राजनैतिक लोग इन्हें अपनी कुर्सी केलिए सब से बड़ा खतरा मान बैठे हैं। हाल में हीं दिल्ली में माननीय उप राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित हुईं रितु जयसवाल का किसी भी पार्टी या नेता से कोई राजनैतिक कनेक्शन तो नहीं है पर राजनैतिक पार्टियां इन्हें एक विनिंग कैंडिडेट के रूप में देख रही हैं, और समय आने पर एक तुरुप के इक्के के रूप में इन्हें भी इस दंगल में उतारा जा सकता है क्योंकि अंदर हीं अंदर सभी पार्टियों में इनके नाम पर चर्चा चल रही है। यदि महागठबंधन से सीताराम यादव या अर्जुन राय को उम्मीदवार बनाया जाता है तो NDA की ओर से रितु जयसवाल को इस चुनावी महासमर में उतारना सीतामढ़ी लोक सभा सीट को सम्मानजनक तरीके से NDA के खाते में डाल सकता है। वैश्य और महिलाओं का तो इन्हें पूरा समर्थन मिलेगा हीं, साथ हीं इनकी अलग छवि और कार्यशैली इन्हें सभी जातियों का भारी समर्थन दिलाएगा। वैसे भी देश और खास कर बिहार की राजनीति में सक्रिय महिला चेहरा न के बराबर है। जो हैं उनमें से अधिकांश के रथ के सारथी उनके पति हीं हैं। यह भी एक कारण है कि रितु जयसवाल पार्टियों की पहली पसंद हो सकती हैं। रितु जयसवाल सीतामढ़ी में एक प्रखर वक्ता के रूप में भी जानी जाती हैं और जिस भी सभा में जाति हैं वहाँ अपने सच्चाई से ओत प्रोत भाषण से लगभग शत प्रतिशत भीड़ को अपनी ओर मोड़ देने की क्षमता रखती हैं।

एक और नाम है सीतामढ़ी के पूर्व सांसद नवल किशोर राय जी का। जमीन पर जनता के बीच तो जा ही रहे हैं, साथ हीं सुनने में आ रहा है कि अपनी पार्टी जदयू के शीर्ष नेतृत्व के भी लगातार संपर्क में हैं। 1998 में समाहरणालय पर हुए हमले वाले मामले में कोर्ट से सजायाफ्ता हैं इसलिए खुद तो चुनाव नहीं लड़ सकते पर अपनी धर्मपत्नी को जदयू से इस चुनावी दंगल में उतारने केलिए प्रयासरत हैं। जनता के बीच मिलनसार व्यक्ति के रूप में जाने तो जाते हैं, यादव जाती से भी हैं पर इस बार के माहौल में लगता नहीं इनके यादव जाती से आने का कोई खास असर वोटों के इजाफे में देखने को मिलेगा। तीन बार नवल किशोर जी ने सीतामढ़ी लोक सभा का प्रतिनिधित्व किया पर अब उम्र भी हो चुकी है और खुद उम्मीदवार भी नहीं रह सकते। ऐसे में राम दुलारी देवी जी अपने रथ के सारथी अपने पति के ज़रिए जनता को कैसे अपनी ओर खींचने में कामयाब होंगी यह तो उम्मीदवारी तय होने के बाद हीं पता चलेगा।

वहीं दूसरी ओर चर्चा यह भी है कि एक मास्टर स्ट्रोक के रूप में भाजपा अपने प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय को हीं सीतामढ़ी से चुनाव लड़ाएगी। सूत्रों से मिली जानकारी यदि सही है तो अध्यक्ष के लड़ने पर यह सीट प्रतिष्ठा का विषय बन जायेगा और पूरी पार्टी एड़ी चोटी का पसीना एक कर देगी यह सीट जीतने केलिए। हालांकि इसकी संभावना बहुत कम है क्योंकि हाल में नित्यानंद जी के द्वारा कुछ सभायें सीतामढ़ी में की गईं लेकिन हवा का रुख संतोषजनक नहीं दिखा। ऐसे में यदि प्रदेश अध्यक्ष की हार होती है तो देश की सब से बड़ी पार्टी की प्रतिष्ठा धूमिल होगी। वैसे भी मीडिया रिपोर्ट की माने तो हाल में हीं नित्यानंद जी ने एक बयान दे कर अपनी उम्मीदवारी उजियारपुर से हीं पक्की बताई है।

इन प्रमुख नामों के अलावा चुनावी महासमर में अपनी किस्मत आजमाने वाले उम्मीदवार भी बहुत हैं जो कहने को तो जाती धर्म सब से ऊपर उठ कर सिर्फ विकास की बात करते गली गली घूमते दिखाई पड़ रहे पर हकीकत में सिर्फ अपनी अपनी जाति का ही झंडा उठाये रखा है और वैसे उम्मीदवारों को हर चुनाव में 10 से 20 हजार वोट मिल हीं जाते हैं अपनी जाति के। विकास के नाम पर यदि इनकी उपलब्द्धि देखें तो बात बनाने और अपनी काली कमाई का एक हिस्सा कम्बल और साड़ी जैसे सामग्रियों के रूप में कुछ जगहों पर वितरण करने के अलावा और कुछ दिखेगा नहीं। इनकी गिनती वोट कटवा के अलावा और कहीं नहीं कि जाति।

5 thoughts on “सीतामढ़ी के अगले सांसद।

  1. Mr. Editor, first topic se hi apne jativad wali rajniti ki bat shuru ki hai phir last me kisi dusre jati ke ummidwar par comment kyon.Jahan tak mujhe lagta h pure bihar me sirf aur sirf jativad wali rajniti hi hoti h.

  2. चुनावी बिसात के चेहरे के बारे में बड़े सरल और सटीक ढंग से तर्क और तथ्य के साथ वर्णित किया है । आगे और भी चुनावी जानकारियां सीतामढ़ी लोक सभा के बारे में हालोगों को देते रहेंगे । धन्यवाद ।

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