सीतामढ़ी से पटना बस यात्रा विथ मिथुन चक्रवर्ती- आनंद

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अगर आप Sitamarhi to patna बस से यात्रा करते हैं तो आपने न चाहते हुए भी मिथुन चक्रवर्ती की कई फिल्मों को रिवाईज कर कर के देखा होगा, माथा बउरा जाता है, अगर आप बस में हो और मिथुन की फिल्म न चल रहा है तो आप बड़े भाग्यशाली हो, लक्ष्मिनिया हो, आप झट से आसाराम बापू के नाम से 11 रूपया का बुंदिया वाला लड्डू स्टूडेंटों में बंटवा दे और दुआएं मिलेंगी, लेकिन पता न बस वालों ने मिथुन दा की फिल्में बस मे चलाने के लिए कौन सा contract sign कर रखा है, दुनिया भले टॉम क्रूज, विन डीजल, पेट्रोल और मटिया तेल तक पहुंच गई हो, लेकिन हमारे बस कंडक्टर भिया अब भी मिथुन दा के जबरा फैन है. तीन-चार दिन पहिले पिछलका पोस्ट पर माधव भाई कमेंट किए कि सीतामढ़ी टू पटना बस में है और मिथुन का ही फिलिमवा दलाल देख रहे हैं तो मुझे भी बस यात्रा वाली स्टोरी याद आ गई।

25 फरवरी को सुबह 8 बजे निकले घरे से, शाम में 5ः30 में राजेंद्र नगर से नई दिल्ली ट्रेन थी, भोरे-भोरे उठे, मम्मी पराठा-भुजिया बनाई, 6-7 गो चांप दिए, दही-चीनी चाट कर के घरे से निकले, पूरे ग्लोब पर अपना देश ही अईसन है, जहां दही-चीनी चाट के जतरा बनता है, लेकिन जतरा क्या बना, मिथुन दा से बस में मुलाकात हो गई, बस स्टार्ट होते ही, पीछे से एक गो चचा खैनी मीसते हुए बोले – कहां गेलउ रे कंडेक्टरवा फिलिमवा काहे न चला रहल हउ, रे खलसिया फिलिमवा चलवाओ, तब न मन लगल रहतई, तनिका दूर के यात्रा थोड़े न है, जे अईसही कट जतई, अमित शाह टाईप कंडक्टर ललका भगवा गमछा फहराते हुए, भोरे भोरे पान खाए हुआ है, पान के ललिहट उसके कॉलर पर लगा हुआ है, वो बोलता है “रे फेकुआ कैसेटवा कहां रखले छे लगाओ तनी”, खलासी फेकू एके गो मूजरबियर वाला 3 -4 गो फिलिमवा वाला कैसेट हरियरका झोेरा में से निकालता है, झोरा पर भिन्न भिन्न प्रकार के गंदे निशान लगे हुए है, सबसे आगे हमही बैठे थे, निकाला कैसेट लगा दिया, अब ऑपश्न आया है कि कौन सनिमा देखिएगा, shera mithun

फिलिमवा के नाम चांडाल, चीता, शेरा, शेरे-हिंदुस्तानी, हमें तो समझ में न आ रहा था कि बस में बैठे है कि जिम कार्बेट नेशनल पार्क में, लग रहा था कि किधरो से आके शेर-चीता हबक लेगा, कुछ देर तक रिमोट को ठोकते ठाकते लगा दिया फिल्म शेरा, तनिका देर चला और अब कैसेट किचकिच शुरू हो गया, कभी इनवैलिड लिख दे रहा है, तो कभी रिज्यूम होकर फिर से शुरू हो जा रहा है, कभी तीनो फिलिमवा एके बेर में शुरू हो जा रहा है, बस जब जरकिन में जाता तो टीवी फकफका के बंद हो जा रहा था और जब चिकन-चाकन रोड मिल रहा है तो फिर टीविया चल रहा है, हिल-डोल वाली अद्भुत तकनीक से अवगत हुए,  फिल्म शुरू हुई, धीरे धीरे मिथुन दा हिंसक होते जा रहे थे, हाथ के उंगली भोंक भोंक के केतना गुंडा को मार दिए, ह्यूमन राईट नाम की कोई चीजे न है महराज, ई प्रशांत भूषणवा और शांति भूषणवा कहां गया है, आतंकवादी याकूब मेमन को बचाने के लिए 3 बजे भोरवा में कोर्ट खोलवाता है और ईहां मिथुन सरेआम केतना का आंख फोर-फोर के मार रहा, तो किसी का गर्दनी में छेद कर रहा है, कोई मानवाधिकार का हनन नहीं, पीछे वाला चचा एकदमे सीटी मारने के मूड में थे, तनिका देर बाद सैदपूर पहुंचते हैं, दूबर पातर 15-16 साल के तीन-चार ठो लईकबा चढ़ा है, बालूशाही बेचने के लिए, बगल वाले तीन सीटा पर शायद ऩई नई शादी हुई, दूनों प्राणी के हाथ में मेंहंदी लगा हुआ, सभे अंगुरी में अंगूठी, कान में सैमसंग का हेडफोन घुसेड़े पत्नी अपने पति से फरमाईश करती है – “ऐजी ई बलशहिया लेनु लीजिए, सुने है बहुते प्रसिद्ध है, पिंकीया के मम्मी जब ई रास्ता होके आबे लन त जरूरे बलशहिया लेके आबे लेन”. अब नई शादी हुई है अभी तो पत्नी की फरमाईश पर ये लौंडा तो मंगल ग्रह पर बैंगन उपजा देगा, ई बालूशाही का का चीज है भाई, केवल पत्नी कहे तो सही, अब पतिदेव इनकर हेल्थ कॉंशस है, बालूशाही वाला का क्लास लेना शुरु किया – ई बालूशाही ऐसही खुले में बेचा जाता है, ढक के काहे नहीं रखता है, कितना धूल उड़ रहा है, उपर से ढ़कना चाहिए था, प्लास्टिक वाला ग्लब्स लगाते काहे नहीं हो, 16 साल का बालूशाही बेचने वाला लईकबा भी तपाक से प्रत्युतर में बोला ऐ महराज, जे लेबे के है तो जल्दीए लीजिए ईहां बस ज्यादा देर नहीं रूकता है, ग्लब्स, पै़ड आ हेलमेट पहिन के हमके क्रिकेट खेलने नहीं जाना है, बलसहिया बेचना है, अब बेचारा ले रहा है 1 किलो ही ले रहा था, फिर पत्नी उनकी ओर घूरते हुए नजर से देखी है, अब आधा किलो और बढ़वाया है, यहां से बस खुली चुकी है,

मिथुन चक्रवर्ती पूरे मूड में हैं, कुछ देर बस चला, तनिका देर हुआ न कि गुंडा सब इसके पूरे परिवार वाले को उठा कर ले गया है, एक तो मिथुन के बारे में क्य़ा कहे गरीबों का मसीहा, वतन का रखवाला है, कभी रिक्शा चलाता है तो कभी कमांडो बन जाता है. तभी तो दर्शक उसमें अपनी छवि ढ़ूढंते है. भारत वर्ष में आजादी के बाद सबसे ज्यादा अगर किसी का शोषण हुआ है तो वो है मिथुन चक्रवर्ती, और मिथुन का शोषण अगर किसी ने सबसे ज्यादा किया है तो वो है शक्ति कपूर और गुलशन ग्रोवर ने, इन दोनो कमीनो से कभी भी मिथुन की ख़ुशी देखी नही गई है.  इन दोनों कमीनों ने हमेशा मिथुन को परेशान करने में अपनी पूरी जिंदगी खपाई है और उनकी बहनो पर बुरी नजर भी यही दो कमीने रखते थे. मिथुन  इस शोषण, उत्पीड़न के बाद परेशान होकर के बड़ा-बड़ा बाल बढाता और anarchy मे believe करने लगता है, ऐसे ऐसे हथियार मैंने मिथुन की मूवी में देखी है, शायद सामान्य जीवन में तो संभव नहीं है,  मिथुन की माँ के बारे में क्या कहे दुनिया की सबसे गरीब माँ ओ में से एक होती है और हमेशा कमीने शक्ति कपूर और रंजीत टाईप छुटभैया गुंडो के द्वारा उठा कर के काली पहाड़ी के पीछे या फिर किसी पुरानी फैक्टरी के गोडाउन ले जाई जाती है और फिर मिथुन दा से ब्लैकमेल करने के काम आती है, मिथुनमा को फोन किया गया है कि अगर अपनी मां और परिवार को जिंदा देखना चाहते हो तो निहत्था आओ, पुलिस को खबर किया तो कोई नहीं बचेगा, ई सब चल ही रहा था कि पीछे वाले चचा के आगे एगो आदमी खड़ा हो गया है, चचा पिनपिना गए है, देखने काहे नहीं दे रहा है, पीछे पूरा सीट खाली है और तुम इहां खड़े हो, कहां गया कंडेक्टरवा, इसको भेजो पीछे, वहां जाओ, हटो आगे से, चचा हटवाए उसको, फिर ब्लैकमेल होकर मिथुन को काली पहाड़ी के पीछे खाली हाथ जाना पड़ा, पहिले तो कुछ वो पिटाया लेकिन फेर से मूड में आया निहत्था 200 गुंडो को तो उंगली और हाथ भोंक भोंक के निपटा कर मार दिया, 3-4 हजार गुंडों का नरसंहार करने के बाद मिथुन अपने परिवार सहित सकुशल घर लौटा है, अब पूरे दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान लौट चुकी है, मुजफ्फरपुर पहुंचा हूं, कंडक्टर बोला है कि – जेकरा जेकरा पास टिकट है उ अपन निकाल लो, दोसर बस में ट्रांसफर कर रहे है, कई लौंडे तो भड़क गए, नवविवाहित युग्ल भी भड़क गया कि आप बोले है कि पटना पहुंचाएंगे और बोल रहे है कि ट्रांसफऱ करेंगे दुसरा बस में, कंडक्टर किधर न किधर ब्यार हो गया है, लोग खोज रहा है कि कहां है, उसी से फरियाएंगे, एक तो बोल रहा है कि आज भले तू हमके ठग लिया है बिहान से कोन रास्ता माहे जऐबा, बथनाहा बाजार पर घेर के पीटेंगे, शीशा तीशा सब फोड़ देंगे, माहौल उग्र होने को है, ऐतना में अमित शाह टाईप कंडक्टर फिर पान कल्ला में दाब कर चीबाते हुए प्रकट हुआ है, बहाना बना रहा है कि, देखिए हमार ड्राईवर के समधी का एक्सीडेंट हो गया है, वहीं जाना है, आप सबको सुरक्षित बस पर बैठवा देते है, टेंसन न लीजिए, सीट देबाएंगे महराज, अब जाके माहौल ठंडाया है, जय माता दी बस में ट्रांसफर हुआ है, पूरे बस का पहिला सीट पर बैठे थे हम, अब हमार सीट पीछे से 3-4 सीट छोड़ के हो गया है, यहां बैठते ही यहां भी फिलिमवा शुरू किया है, मिथुन का ही, तनिका देर हुआ न कि गुंडो ने फिर मिथुन का उत्पीड़न शुरू कर दिया, लोग ताली पीट रहे थे, हम तो अपन कपार पीट रहे थे कि अबे मिथुन मुझे बख्श दो बे, यहां भी दुर्दांत अपराधियों वाला सनिमा चल रहा है, अब हम कान में हे़डफोनवा घुसेड़ कर बैठ गए, हाजीपुर तक पहुंचे तब तक केला ले लेकर लईकन सब चढ गया आधा दर्जन केला खरीदे है, खा खा के पॉलीथीन में रख रहे है, रास्ते पर फेंकना नहीं है, काहे से मोदीजी बोले है स्वच्छ रखो भारत को, गांधी सेतु तक पहुंचते ही देख रहे हैं कि लोग सब अपने जेब में से खुदरिया निकाल निकाल कर गंगा नदी में फेंक रहा है, कोई पंचटकिया फेंक रहा है तो कोई 2 टकिया, बलसाही बेचने वाले को गलब्स हेलमेट पहनाने वाला भी 5 टकिया फेका है, पत्नी बोली है हमरो बदले फेंक दीजिए, फिर फेंका है,  श्रद्धा का ये विकृत रूप को देख के हमके बुरा लगा, क्या गंगा मैया ऐतना चिल्लर खुदरिया इकठ्ठा कर के पी एंड एम मॉल थो़ड़े न कपड़ा लत्ता खरीदने जाती होगी, ये तो नुकसान है, भारत सरकार का नुकसान है भाई, हमारा-आपका नुकसान है भाई, मैनें तो एक दू गो के समझाने की कोशिश भी की कि मत फेंकिए, लेकिन माने कौन, एक बुढ़उ बाबा तो ऐसे घूर रहे है जैसे मैने इनके दरवाजे पर से बांधी हुई बकरी खोल लिया हो.

कार्ल मार्क्स बाबा कह गए थे कि – “धर्म अफीम के समान है” और अपने इहां तो धरम अफीम, चरस, गांजा, हिरोईन सब है, धर्म और आस्था तो छोड़िए बकरी,गाय के नाम पर आदमी को मार दिया जाता है तो ई भारत सरकार के डिफिसीट (घाटा) को कौन पूछ रहा है भाई, फेर हमरो बुझा गया की हमही एबनार्मल है, बकलोल है.

फेर एगो डाटा याद आ गया, कि अबे  करीब 30 वर्षों पहले 1985 में गंगा एक्शन प्लान की नींव रखी गई थी तब नदी को स्वच्छ बनाने के लिए 20,000 करोड़ रूपया आवंटित की गई थी, लेकिन सफाई का क्या कहे और नाली उली सब ओहि में बह रहा है, गंगा साफ होने के बजाय और गंदे हो गई है. ऐतना सारा रूपिया कहां बर्बाद हो गया कौन जाने भाई, मतलब 20000 करोड़ रुपया गंगा में सरकार द्वारा उझिला गया, और गंगा मैया और मैली हो गई, भले ये राशि आस्था के नाम पर एकटकिया, दूटकिया फेंकने से तो बहुते ज्यादा है, लेकिन नुकसान तो दोनो अपना ही है, देश का ही नुकसान है.

खैर, तब तक पटना अगम कुंआ पहुंच चुके थे, जोर-जोर से खलासी दरवाजा पीट कर चिचियाया है, गायघाट, अगम कुआं वाले गेट पर आईए, हमहूं अपन बैग सरियाए और लैंड कर गए है.

जय हो।

— आनंद

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