सोनबरसा से सीतामढ़ी का बस सफ़र…

images (3)दोस्तों, सफ़र ऐसे भी मुझे बहुत पसंद है लेकिन अगर बात मेरे गांव से सीतामढ़ी जाने की हो और वो भी बस से तो कहना ही क्या। शायद इतना मज़ा आपको राजधानी ट्रेन में भी नहीं मिलेगा जितना महज एक घंटे के सफ़र में आपको मिल जायेगा। यहाँ आधुनिक सुविधाएँ तो नहीं होंगी लेकिन अगर आपकी आदत लोगों को गौर करने उनकी हरकते बारीकी से देखना पसंद है तो फिर आपको बहुत मज़ा आने वाला है, ये मैं यकीं के साथ कह सकता हूँ।

आइये आपको लिए चलता हूँ ऐसे ही एक सफ़र पर जो सोनबरसा से सीतामढ़ी के बीच की है। यदि आप कही और के है तो कल्पना कर लें की सफ़र आपके गांव और सीतामढ़ी के बीच की है।

मैं परसा मोड़ पर बस में घुसा,क्योंकि चढ़ने की तो जगह होती नहीं है और कोई देता भी नहीं है। इसीलिए खुद घुसना पड़ता है, कभी कभी कंडक्टर भी खींच के चढ़ा देता है।अब गर्मी इतनी ज्यादा है की मेरी शर्ट पूरी भीग चुकी है। फिर भी मैं पीछे जाने की कोशिश कर रहा हूँ की कहीं कोई सीट का जुगाड़ लग जाये।हालाँकि जगह खरे होने के लिए भी प्रयाप्त नहीं है। फिर भी कोशिश जारी है।मेरे पीठ पर मेरा बैग भी है,जो ना जाने कितने लोगों को धक्के मार चूका है।फिर भी उसे कोई अफसोस नहीं है।खैर किसी तरह मैं जंग जीत के बस के बिच में पहुँचा,तब तक बस अगले पड़ाव पर पहुँच चुकी थी और कुछ और यात्री घुसने का प्रयास कर रहे थे।संयोग से जो चाचा जी मेरे सामने अपनी धोती जांघो तक चढ़ा के बैठे थे उनको आगे भुतही में उतारना था इसलिए अब मैंने अपनी सारी ध्यान उस सीट पर लगी दी। वो जैसे ही उठे मैंने झट से उस सीट को लपक लिया।ख़ुशी इतनी मिली की जैसे UPSC निकल गया हो।छाती चौड़ी कर के मैं बैठ गया।बस भुतही से आगे बढ़ी।जितने उतरे नहीं उससे कहीं ज्यादा चढ़ गए। एक भाई साहब जो बिलकुल मेरे माथे की ऊपर ही खरे थे उनके खुश्बूदार पसीने की बुँदे मेरे चेहरे पर टप टप गिरी। मैंने उनसे विनम्रता से अनुरोध किया आप थोड़ा उधर हो जाइये।वो भी ऐसे घूर के थोड़ा सा खसके की जैसे मैंने उनसे उनका जायदाद मांग लिया हो।इतने में आगे से कंडक्टर जी पहुँचे पैसा लेने।आप गौर करना एक दो लोगो ऐसे जरूर होते है बस में जो कम पैसे देंगे और बिना कंडक्टर से गाली गलौज किये मानेंगे नहीं। मुझे इस वार्तालाप में सबसे ज्यादा मज़ा आता है। एक ऐसा आदमी यहाँ भी था। जो दो रूपये के लिए भिड़ गया।उन दोनों के बीच जो वार्तालाप हुई वो मेरे लिए काफी ज्ञानवर्धक थी। मेरे गालियों के शब्दकोष में कई नई नई गालियां जुड़ गई।इसी बीच दोनों हाथ बस के ऊपर लगे रॉड को पकड़ कर पसीने से तर बतर सामने खड़े चाचा जी का फ़ोन बजा और रिंगटोन इतना तगड़ा था की सभी लोग उनके तरफ घूम गए जैसे उन्हों ने कोई गुनाह कर दिया हो। और रिंगटोन का गाना……बेपनाह प्यार है आ जा।😃😃

हमेशा की तरह कंडक्टर के पास खुल्ले पैसे नहीं थे उसने मुझे बोला बाद में दे देंगे….मेरा आधा ध्यान तो उधर ही चला गया की कहीं पैसे लेना ना भूल जाउं।इन सब के बीच बस में लगी हुई टीबी पर अश्लीलता की तमाम हदें पार करती हुई भोजपुरी संगीत बज रही है। बच्चे, बूढे और कुछ लोग सपरिवार इसका आनंद ले रहे है।बस आगे बढ़ रहा है।जितने लोग बस के अंदर है उससे कही ज्यादा बस के ऊपर। संतुलन भी जरूरी है ना भाई।ऊपर से पान खा रहे किसी ने 100 ग्राम थूक फेंका,हवा बहुत तेज चल रही थी।मेरे आगे खिड़की की तरफ से बाहर मुँह निकल कर बैठे भाई साहब का मुँह अचानक लाल हो गया।😜😜    बस रुकी नहीं है अपने अंदाज़ से “चल”रही है।थोड़ी देर बाद बस आगे रुकी,ड्राईवर साहब को लघुशंका जाना था।कुछ लोग और लघुशंका के लिए उतार गए। जब फिर से बस चल पड़ी तो पीछे से एक आवाज़ आई -“हो मरदे दिनेश पेशाब करे गेलई त ओम्हरे रह गेलई… छूट गेलई जानु।”यहाँ आपकी हंसी कोई नहीं रोक सकता। भले ही दिनेश को आप भी की क्यों ना जानते हों। अब बस खड़ी है मेहसौल गुमटी पर।फाटक गिरा हुआ है। जिनको ज्यादा जल्दी है वे लोग उतर कर लोहे के नीचे से इधर उधर देखते हुए भाग रहे है। कुछ देर बाद बस अपने अड्डे पर पहुँच गई।सब लोग उतरे…सब के हाथ में सामान था।जो खाली हाथ चढ़े थे उनके हाथ में भी। मैं कंडक्टर के पास अपने बाकी पैसे लेने गया….खुद से आकर तो वो देता नहीं। मैं भी अपने रास्ते निकल गया।

आया न मजा आपको भी हवाई जहाज और वातानुकूलित ट्रेनों से ज्यादा,जहाँ लोग चुप चाप अपने आप में मसगूल रहते हैं।

7 thoughts on “सोनबरसा से सीतामढ़ी का बस सफ़र…

  1. बहुत हीं सुंदर रचना है। पढ़ कर आनंद आया।

  2. हाहाहा वैसे, आपके हाथ में सामान घुसते वक़्त था या उतरते वक़्त..!

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