हमारी क्रिकेट जिंदगी….मज़ा लीजिये।

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क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिससे भारत में कोई ऐसा बच्चा नहीं होगा जो परिचित न हो। हमारे लिए यह एक खेल मात्र नहीं है बल्कि हमारे जीवन का एक हिस्सा है।कुछ लड़के गली में चलते हुए गेंदबाज़ी का अभ्यास करते हुए मिलेंगे आपको तो समझ जाइयेगा ये वही लोग हैं जिनका सपना तो क्रिकेट था लेकिन हाई स्कूल से निकलते निकलते वो सपना वहीं टूट गया। फिर कंधो पर कैरियर का बोझ लिए गांव और छोटे शहरो से राजधानी पटना और दिल्ली के लिए प्रस्थान कर गया।हमारा सारा क्रिकेट करियर वही ख़त्म हो जाता है जहाँ से शुरू होना चाहिए था। कितना मेहनत से ये छोटा सा क्रिकेट कैरियर बनाये थे। 20 रुपया-50 रुपया का मैच खेल खेल के।भर दुपहरिया बउआते रहते थे खेलने के चक्कर में भुखले पियासले। शाम में घर जाते थे त बाबु गरियाने के लिए तैयारे बईठल रहते थे। कभी कभी त सोंटा भी जाते थे परीक्षा के टाइम पे। बाबु जी का कोटा पूरा हो जाता था त फिर माई शुरू होती थी…अभिये पोंछा लगाए है….छौरा पूरा लाते लाते कर दिया। भर दिन हेरायल गधा जइसन बउआता रहता है। मेरा पूरा घर गंदा कर देता है।न खिंचबउ आई से तोहर कपड़ा…. जो भाग यहाँ से। मुँह लटकाये वहां से निकल जाते थे हम भी चुप चाप। शाम में जब पढ़ने बईठते थे तब इतना अउंघी आता था कि आधा घंटा में किताब उताब समेट के सूत जाते थे। भोरे उठने से पहले छौरा सब घर के बाहर खड़ा रहता थे बैट बॉल ले के…साला बेरोजगरबा सब।
और मोहल्ला में जो हम लोग खेलते थे धिया-पुता में तो बुढ़बा सब अइसे घूरता था जैसे अलकायदा का ट्रेनिंग कैंप चल रहा हो।लेकिन कुछ ख़ास उखाड़ भी नहीं पाते थे वो लोग। बहुत पिताते थे तो उनके घर में बॉल जाता था तो रख लेते थे, फेर हम सब फांट लगा कि दोसर बॉल किन लेते थे। और कभी शीशा फुट जाता था तो जब तक घर वाला निकल के आता तब तक हमलोग पार हो चुके रहते थे। हालाँकि हम लोग सब घर में उड़ते उड़ते जाना आउट रखते थे लेकिन फिर भी कभी कभी हम लोग के अंदर का धोनी जाग जाता था त मार देते थे उठा के। सबसे ज्यादा दिक्कत त ईंटा वाला विकेट ठीक करने में होता था जब एक बार गिर जाता था था त साला केतना मेहनत से खपटा खपटी लगा के उसको खड़ा करते थे।टेस्ट मैच भी हमलोग उसी में खेल लेते थे। आधा घंटा में ही ख़त्म हो जाता था। नियम ही इतना टाइट रहता था। एक टप्पा खा के एक हाथ से कैच कर लिए त आउट।जानते ही होइएगा अगर मोहल्ला में मिनी खेले होइएगा तो। सही मायने में हम लोग बैट बॉल खेलते थे क्रिकेट नहीं।काहे की बैट बॉल के अलावा हम लोग के पास कुछ रहबे नहीं करता था। 6 गो लइका में 3-3 गो का टीम बना लेते थे। और अगर उससे कम रहा तो एगो को पीछे घुमा के उसके पीठ पर नम्बरिंग कर लेते।कोनो घूमने के लिए तैयारे नहीं रहता था।कुछ इस तरह से हम लोग बचपन में खेलते थे।
बड़ा मजा आता था सच में।आजकल तो माँ बाप बच्चा को जबदस्ती भेजता है बाहर खेलने तब भी बच्चा नहीं जाता है काहे की मोबाईल से चिपका रहता है। और हम लोग गाली सुनते थे की भर दिन खेलते रहता है। यही फर्क आ गया है।
बाहर खेलने से इंसान का संपूर्ण विकास होता है। खूब खेलना चाहिए बचपन में। आखिर बचपन है ही खेलने के लिए….और अगर सचमुच आपकी रुचि खेलने में है और उसी में कैरियर बनाना चाहते हैं  तो जरूर प्रयास करना चाहिए।

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