हिंदी मीडियम – आनंद

हिंदी मीडियम

–      hindi       

दिनांक 30-04-17, रात के 11.30 बज रहे है, नई-दिल्ली रेलवे स्टेशन पर 8 घंटा लेट ट्रेन का वेट कर रहा हूं, जहां खड़ा हूं, वहां से बाएं साईड में पीकदान है, न चाहते हुए भी उधर नजर चली गई है, अंधाधुंध लाल-पियर कमला पसंद, शिखर, विमल पान मसाला (दाने-दाने में केसर का दम – अजय देवगन जी वाला) की थूक से पीकदान की बाह्य परत सुशोभित हो रही है, भिन्न-भिन्न प्रकार के गुटखों के थूक के सम्मिश्रण से ये उजला चमकदार ये पीकदान, ललिहट से चमकने को मजबूर है, कान में सोनी कंपनी का हेडफोन लगाए एक भद्रपुरूष पहुंचे है, 5 फीट दूर से ही रेंज बना के पीकदान की ओर थूक दे मारे है, अगले ही क्षण गंतव्य तक थूक पहुंच चुकी थी, अद्भुत प्रतिभा देखने को मिली, फिर मोबाईल में रनिंग ट्रेन स्टैटस और फेसबुक नोटिफिकेशन खोल कर चेक करने लगा हूं, अचानक से एक बुढ़उ बाबा हरियरका ललका कंबिनेशन के फीता वाला बैग कंधा पर रखे इस्केप वेलोसिटी से ट्रेन टाईमिंग इन्क्वायरी के लिए बगल से गुजरे है, बैग में लगे लौह धातु से हमर कनपटा छिछोर दिए है, मेरे अंदर से गुस्सत्व वाला फीलिंग विस्फोटित होने ही वाला था कि तभी उनकर मरियल चेहरा, चेहरें पर पड़ी झुर्रिया, आंखों में करूणा और मदद मांगने का भाव झलक रहा है, साथ में उनके एक 20-25 वर्ष की लेडी है उनके हाथ में 2-3 वर्ष का शिशु है, कनपटा के दरद को इन्हें देख हम अपने कनपटा पर हाथ फेरते हुए इगनोर कर दिए है, अब बुढ़उ बाबा पहुंचे है इन्क्वायरी काउंटर पर, इन्क्वायरी काउंटर पर जहां हम खड़े है वहां से दाएं 5 कदम आगे, 15-20 लोग के पीछे है, काउंटर पर पहुंचकर ट्रेन संबंधी जानकारी पूछे है कि पटना जाए वाला ट्रेन कै बजे है, उधर से बोला है, सारा ट्रेन का नाम लिखा हुआ है बोर्ड पर पढ़ लीजिए, बुढ़उ बाबा ज्यादा पढ़े लिखे नहीं है, बोर्ड की ओर देख ही रहे थे तब तक दू -तीन ठो नौजवान इन्हें धकिया के बाहर कर दिया है, इनको पता भी न चला कि लाईन में कभी हम थे भी, फेर बुढ़उ बाबा लाईन में लगे है, फेर काउंटर पर पहुंचे है, इनको फिर बोला है कि सारा लिखा हुआ है, पढिए और हटिए आगे से, बोर्ड पर अंग्रेजी में लिखे ट्रेन का नाम नंबर उसे न पढ़ पाने से चिंतित है, शायद यही सोच रहे हैं कि हमें भी इंग्लिश आती होती, फेर डांटा है, सीसा उस पार से कि हटिए आपके पीछे कोई दूसरा भी खड़ा है, इस बार अनमने ढंग से खुद ही वो लाईन से निकल गए है, और पास में लगी लाउडस्पीकर से हो रही ट्रेन उद्घोषणा पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश किए है, 5-7 मिनट तक एक ही मुद्रा में काऩ दक्षिण दिशा की ओर से आ रही लाउडस्पीकर की ओर लगाने के उपरांत भी इन्हें निराशा ही हाथ लगी है ठीक से सुन नहीं पाए है, ये अकेले नहीं है, कई ऐसे लोग है, जो बोर्ड पर लिखी गई अंग्रेजी मे ट्रेन का नाम पढ़ न पाने के कारण यहां चिंतित है,

 मेरे पास आकर वो खड़े हो गए है, मैने उनसे पूछा है कहां जाना है, बैग सरियाते हुए बोले है, पटना जाए के है, वहां से मुजफ्फरपुर के बस पकड़ेंगे, सांझे आठे बजे से बैठे है, पता है नहीं कि कौन ट्रेन जाएगी, मुनिया के माई के तबियत खराब है, उसी को देखने के लिए जा रहे है, इन्क्वायरी वाला ठीक से बताता नही है, 2 बार गए है, पीछे वाला धक्का मुक्की कर के भगा दिया है, हिंदी में लिखा रहता है तो पढ़ भी लेते थे, अंग्रेजी में लिखा है, एक तो रतिया में लउकाता नहीं है, सामने उ टीविया पर लाल रंग से ट्रेन का नाम लिखाता है लेकिन जबतक पढते है तब तक मेटाईए जाता है, स्पीकर में भी जल्दी-जल्दी बोल दे रहा है, लेडीस (लेडिज) वाला लाईन में तो भीड़ नहीं है, लेकिन मुनिया को भी अंग्रेजी पढ़ने नहीं आता है, पूरी कहानी एके सांस में बुढ़उ बाबा बोल दिए.

अब मेरे पास दो  Option था, एक तो मैं इनको चुपचाप ट्रेन का टाईमिंग बता दूं और दूजा रेलवे कर्मचारी को सारे ट्रेन का नाम अंग्रेजी के अलावा हिंदी में भी लिखने बोलूं,

हम बुजुर्ग बाबा को बोले ठीक है, रुकिए अभी आपको बताते है, मोबाईल पर IRCTC website खोले है, भोरे 6 बजे से लेकर रतिया के 11.40 ब्रह्मपुत्रा मेल एक्सप्रेस तक सारा ट्रेन के नाम बैग से एक पेज निकाल कर हिंदी में लिख दिए है, अब बोले है कि चलिए इन्क्वायरी वाला से बतियाते है, 25 गो के पीछे लाईन में लग गया हूं, बुढउ बाबा को भी लगाए है साथ में चलिए, खिड़की गेट पर पहुंचा हूं, मैने विनयपूर्वक ही खिड़की उस पार बैठे भाई से भाषा की व्यथा, अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी ट्रेन नाम लिखने और जो पूछने आ रहा है उसे बताने का अऩुनय किया है, पहिला बेर में इगनोर कर दिया है, गरमाकर बोला है हटिए लाईन में से, आप लाईन में नहीं थे, कहीं बाहर से घुसे है, लाईन से हट गए है, बुजुर्ग बाबा को बोले है कि आप बैठिए, हल्ला गुल्ला नहीं करना है, चलो आज बारह बजे रतिया में ही सत्याग्रह हो तो सही, हम फिर जाकर पीछे लाईन में लगे है, 20 गो के बाद फिर काउंटर पर पहुंचे है, फिर मैंने उससे अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी में भी ट्रेन का नाम लिखने और बोल कर लोगों को बताने की बात कही है, इस बार शायद उसका मन पिघला है, उसने हिंदी में लिखना शुरू कर दिया है.

सच कहूं तो मुझे उस रेलवे कर्मचारी पर बिल्कुल भी गुस्सा नहीं आ रहा था, क्योंकि मैं, आप, हम सभी उसी कल्चर का हिस्सा है, और वो भाई कोई मंगल ग्रह से तो आया नहीं है, वो वैसे ही लिखने को अभ्यस्त है, मैं अंग्रेजी का बिल्कुल विरोध नहीं करता हूं, मैं दोनों भाषाओं को समान महत्व देने की बात करता हूं. पिछले कई दिनों से सरफराज अहमद Pakistanका champions trophy- 2017 विजेता captainहै, लोग उसके अंग्रेज़ी का मजाक उड़ा रहे है, क्या सफलता  का मानक अंग्रेज़ी  है, लेकिन  कट्टरतापूर्वक अंग्रेज़ी का boycott करना भी  बेवकूफी है, समन्वय  होना चाहिए. 

अपरिपक्व था तो मैंने भी पिछले साल सी-सैट हटाने के लिए यू.पी.एस.एसी. के गेट के बाहर हो रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन में हिस्सा लिया था, तो 2 डंडा पिछवाड़े पर दिल्ली पुलिस मारा था, और हम है कमजोर, आम आदमी, दू चार डंडा चेंप दिया तो, अलंग अलंग दरद देता है, लेकिन अब थोड़ी सी समझ आयी है, अब मैं अंग्रेजी का बिल्कुल विरोध नहीं करता हूं,  यह आज की जरूरत नहीं मजबूरी है, और जो आपको अंग्रेजी के स्थान पर हिेंदी भाषा लाएंगे जैसे आंदोलन की बात कर रहा है तो वो आपको सुतिया बना रहा है, अब बताईए केवल हिंदी और भोजपूरी जानने वाला व्यक्ति की पोस्टिंग नागालैंड या फिर साउथ के किसी राज्य में होती है तो वो कैसे काम करेगा, यहां पर अंग्रेजी की जरूरत महसूस होती है और वो जोड़ती है पूरे देश को, अपने बिहार सरकार की पॉलिसी ऐसी है, एक तो हम यूरिया के बोरिया बिछा के आम के पेड़ के नीचे पढ़े है, गांव के प्राईवेट स्कूल में भी लिखने लायक अंग्रेजी पढ़ाई जाती है, कि सब कुछ में पास हो जाओ, लेकिन अंग्रेजी को मारो गोली, 10वीं में अंग्रेजी में आप किता भी नंबर ले आओ वो टोटल में जुड़ेगा नहीं, यहीं से लड़के इगनोर करना शुरु कर देते है, और तो और अंग्रेजी विरोध और हिंदी को प्रमोट के नाम पर ये चिल्लर छाप नेता आंदोलन भी शुरु कर देते है, स्टूडेंटों को भड़काना शुरू करते है और अंग्रेजी हटाओ-हिंदी लाओ के नाम पर नेता बन जाते है, और स्टूडेंट झाल बजाता रह जाता है, भाषा टकराव कोई नई बात नहीं है, स्वतंत्र  भारत में साठ के दशक में अंग्रेजी हटाओं-हिन्दी लाओ के आंदोलन का सूत्रपात  राम मनोहर लोहिया ने किया था लेकिन वे भी विचार और शोध की भाषा के रूप में वह अंगरेजी का सम्मान करते थे, इतना बड़ा देश है अपना, केतना कल्चर है, साउथ वाले तो हिंदी को साम्राज्यवादी भाषा मानते है, पिछले दिनों साउथ में तो अंग्रेजी के साथ हिंदी लिखे जाने का भी  विरोध हुआ और डी.एम.के जैसी पार्टियों का पॉलिटिक्स आज भी हिंदी विरोध के नाम पर ही चलता है,

आज फेसबुक, व्हाटस अप के सूचना क्रांति वाले युग में तो अंग्रेजी की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है, जहां पूरा विश्व ग्लोबल विलेज में तब्दील हो चुका है.  लेकिन फिर भी मन में विरोध है, भाषा अंग्रेजी से नहीं अंग्रेजियत से, उस कल्चर से, जहां आपको खुद को उस माहौल में ढालने को मजबूर किया जाता है, जहां ऐड दिखाया जाता है कि डियो का स्प्रे मारते ही लड़को पर मॉडल्स को फिदा हो जाती है, जॉकी के कच्छे बनियान पहिनते ही,  लाल पियर लिपस्टिक वाली girlfriend मिलने लगती है, फेयर हैंडसम लगाते ही आप आधा घंटा में चिकना जाओगे, आपको जबरदस्ती उस परिवेश में ढालने का प्रयास कराया जाता है, सतुआ-गुड़ की जगह पिज्जा बर्गर घर-घऱ तक पहुंचाया जाता है, दिल्ली मे हम देखते है चना बेचने वाला 5 रुपया अधिक मांगता है तो कुछ  मैकाले की औलाद, dirty & nonsense गंवार की संज्ञा दे देते है but restaurant में पिज्जा वाले को 100₹ टीप देकर आते है, और किसानों के आंदोलन को हिंसात्मक तरीके से निपटने के लिए Facebook, twitter पर वक़ालत करते नजर आतेहै

बेल और संतरा के जूस के बदले थम्स अप और माउंटेन डियू आ जाता है, ऐसा नहीं है कि मैं बॉयकाट कर रहा हूं, समन्वय की बात कर रहा हूं, हम तो दूनो पीते है, लेकिन उस माहौल की बात कर रहा हूं, जिसमें आप को मजबूरन ढालने का प्रयास कराया जाता है,  ऐसा बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए कि हमें अंग्रेजी नहीं आती है तो आप खुद को दीन-हीन समझने लगो, हम सरकारी स्कूल के ही है तो क्या हुआ, केवल अंग्रेजी जानना ही आपके अच्छे व्यक्तित्व का मानक नहीं है, ये तो कल्चर है भईया, हम जिस माहौल में रहेंगे, सीखेंगे, वैसे ही तो बोलेंगे,  अपने भाषा का सम्मान कीजिए, दूसरी भाषा भी सीखिए जरुर सीखिए, क्योंकि ये वक़्त की मांग है, लेकिन अंग्रेज़ी के कीमत पर पर अपने हिंदी की यज्ञ वेदी मे आहुति न दीजिए.

जय हो.

—- आनंद


 

Add a Comment

Connect with us on: