हे महादेव, उम्मीद मत मारिए, स्वप्न मत उजाड़िए…


सड़क के किनारे नन्हें-नन्हें कदमों को आगे बढ़ाते हुए, पीठ पर बस्ते में वजनदार भविष्य और आंखों में कौतूहल लिए। अरे आज तो शनिवार है, क्लास में अंताक्षरी होगा। मुझे म से कई सारे गाने याद है. ये सड़क पर खाली बोतल पड़ा हुआ है, इसको पैर से लतियाकर मैं सबसे दूर मारूंगा. तू मार के दिखा. वो बगल से आईसक्रीम वाला गुजरा है, मीठा बर्फ वाला टन टन बजाते हुए. आज मम्मी तो 2 रूपया ही दी है, और हम है 5 दोस्त छोड़ो कल खाएंगे।

ये आम बच्चे है, चाहे बिहार में सुदूर गांव के किसी सरकारी स्कूल में यूरिया और डी.ए.पी खाद वाला बोरिया बिछा के पढ़ने जाते हो या मेट्रो सिटीज के 5 स्टार होटल टाईप स्कूल में पढ़ते हो. इनके मन बिल्कुल कोरे कागज के समान होते है। इन कोरे कागज पर आप जो लिखना चाहो लिख सकते हो. इनकी बात ही निराली है। ये खुद ही रूठते है और खुद ही मन जाते है। ये जिनसे झगड़ते हैं उन्हीं के साथ रहते है, इनके लिए कोई गैर नहीं. इन्हें किसी से बैर नहीं।

ये कंधे पर बैग टांगे या हाथों में स्लेट, चाक और कमल हिंदी या मनोहर पोथी लिए चलते हैं तो दिशाएं स्तब्ध होती है. ये केवल अपने घरों के रौनक नहीं होते, प्रकृति भी इनके नखरों का स्वागत करती है, पक्षियां चहचहा कर इनको छेड़ना चाहती है। इन्हें दीवारों पर हर जगह लगे लक्स, फेयर हैंडसम और वो डियो का प्रचार सिक्स पैक एब्स लिए कर रहा विज्ञापन आकर्षित नहीं कर सकता, ये विज्ञापन में सफेद रंग की चमकती दमकती यमी गौतम और रिलैक्सों का चप्पल पहने सलमान खान से अधिक पसंद है. घंटी बजाते रोज टिफिन के वक्त गुजरता दो रूपयाही बर्फ बेचने वाला फेरी वाला या आईसक्रीम वाला।

जब भी छोटे-छोटे बच्चों को कंधे पर बैग टांगे देखता हूं तो सीधा फ्लैशबैक होता है और बचपन में चला जाता हूं, स्मृतियां तरोताजा हो जाती है कि कैसे हम राहुल, रंजन, पंकज, बिटू व अन्य मित्रों के साथ एके कलर का पैट शर्ट पहने कंधे पर औकात से ज्यादा किताब लोड किए पैदल स्कूल जाते थे। मूली, गाजर, मटर और आम तोड़कर खाना और उसके बाद बगीचा रक्षको को चिढ़ाकर भागना, सारे शैतानियां आंखों के सामने आने लगती है।

आज भी सुबह वैसे ही हुई है, जैसे अन्य दिन हुआ करती है। परेशानियां भी वहीं है, पिताजी मुखिया के यहां चक्कर लगा रहे होंगे. मुखियाजी घूस मांग रहे है, मनरेगा में मिट्टी खोदे थे, अबतक पैसा नहीं आया, बैंक आधार से लिंक नहीं हुआ इसलिए पैसा नहीं आ रहा। होली मनाने के लिए बच्चों ने जिद कर रखा होगा, बिना नया कपड़ा पहने हम होली नहीं खेलेंगे। मां परेशानियों से जूझ रही है लेकिन एक सुयोग्य प्रबंधक बनकर अपना परिवार उपयुक्त तरीके से चला रही है। स्कूल जाने के लिए अपने चांद के टुकड़े को तैयार भी कर रही, आज फिर वो चांद लग रहा, काला टिका लगा के माथे को चूमते हुए स्कूल जाने के लिए हंसते-हंसते विदा किया है। उन्हें क्या पता आखिरी बार उसे देख रही है। परेशानियां पुरानी है लेकिन स्कूल भेजते वक्त उम्मीदें नयी है, आंखों में सपना संजोय, हमारा बेटा Officer बनेगा, हमारी जिंदगी तो गरीबी में बीत गई लेकिन हमारी बिटिया आफिसर बनेंगी। लेकिन उन्हें क्या पता आज काल क्या खेल खेलेगा. काश मां आज अपने बच्चों को स्कूल नहीं जाने दी होती.

आज हर कोई जल्दी में है। हम सभी इतने जल्दी में है कि दूसरों की कोई परवाह ही नहीं,
हमारी एक गलती दर्जनों, सैकड़ों परिवारों की उम्मीदे छीन सकती है लेकिन हमें इसका घंटा नहीं फर्क पड़ता है, क्योंकि मैं सबसे तेज हूं. आज गाड़ी की स्टेयरिंग मेरे हाथों में। रोड साईड में स्कूल है तो क्या हुआ, आज गाड़ी मैं चला रहा हूं, सड़क पर सावधान बच्चे है लिखा भी होगा तो मुझे घंटा नहीं फर्क पड़ता है। सड़क पर ठोकर बना होगा तो क्या हुआ मैं उधिया के जाउंगा, कौन रोकेगा मुझे चाचा विधायक है हमारे, फूफा दरोगा है, मामा फ्लाना है, ढीमका है… और कुछ नहीं तो सामने वाले पुलिस को 100 रूपया घूस दे दूंगा, लेकिन सिग्नल तोड़ूंगा. रोड पर गाड़ी हवाई जहाज जैसे चलाउंगा, क्योंकि आज स्टेयरिंग मेरे हाथ में है। मैं हूं सबसे तेज. बाईक पर हूं तो मैं सबसे तेज, गाड़ी में हूं तो मैं माईकल शूमाकर का औलाद, रोड पर हूं तो मैं उसेन बोल्ट का पोता, बिजनस में हूं तो मैं सबसे आगे, मै सबसे आगे, आगे बढ़ने का तरीका चाहे कोई भी हो. मैं फलाना, मै ढीमका, मैं प्रधान मंत्री, मैं मुख्यमंत्री, मैं घंटा, ब्ला ब्ला ब्ला…

काश समय की धुड़ी उस समय रूक जाती, काश प्रकृति एक क्षण के लिए उन सभी बच्चों का हाथ थाम लेती. काश महादेव अपने भुजाओं से उन्हें बचा लेते, काश कोई पीर बाबा या अल्लाह उन्हें इन असामयिक मौत से बचा लेता, काश कोई जीसस क्राईस अपनी शक्तियों से उस समय कोई चमत्कार कर देता।

कुछ नहीं, कुछ नहीं. एक दो दिनों तक केवल बिहार के पेपरों में छाया रहेगा. फिर सभी भूल जाएंगे. टेंशन नहीं लीजिए न्यूज चैनल में भी घंटा नहीं डिबेट चलेगा, क्योंकि ये कोई करीना कपूर का तैमूर तो है नहीं जो मीडिया उसके टट्टी के कलर से लेकर कच्छे के डिजायन तक पता लगा ले. शाहरूख की बेटी सुहाना तो है नहीं जो उसके बिकनी के कलर से लेकर उसके ब्वायफ्रेंड की चड़्डी तक का पता लगा ले, मरने वाला आम, मेरे आपके जैसे परिवार का एक ही छोटा सा उम्मीद था, कोई बात नहीं और हमारी औकात ही क्या है, भारतीय ज्यूडिश्यरी भी कच्छप गति से चलती हुई गुनाहगारों को सजा देगी. जो गाड़ी चला रहा होगा उसके पास लाईसेंस नहीं होगा, होगा तो फ्राड तरीके से बनवाया होगा, 20 साल तो कम से कम न्याय मिलने में लगेगा. हम आप भी भूल ही जाएंगे, सरकार मुआवजा दे देगी। लेकिन उम्मीद मर चुका.

रोड पर चारो ओर खून पसरा होगा, किताबें खून से सनी होगी, मनोहर पोथी और कमल हिंदी के पन्ने हवाओं के वेग से वहीं उलट रहे होंगे। मां की गोदे सून हो चुकी होगी, दर्जनों परिवारों का उम्मीद मर चुका होगा. आखिरी सहारा तड़प कर दुनिया छोड़ जा चुका. हम फिर कल से माईकल शूमाकर का पोता बनकर गाड़ी को उधियाते हुए गुजरेंगे। क्योंकि हमें घंटा नहीं फर्क पड़ता है।

हे महादेव, आप तो संहारक है, इन निर्दोषों के प्राण हरते आपके हाथ नहीं कांपे होंगे. हे रूद्र, दर्जनों परिवारों का उम्मीद मत मारिए. क्या आप नहीं जानते वो पूरे घर का रौनक रहा होगा. कितनी उम्मीदे उनसे होगी, कितने स्वप्न सजाए गए होंगे. हे शिवाय बस. बस बस………..

आनंद कुमार
सीतामढ़ी

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