एक नाटककार, अभिनेता और आर्किटेक्ट से मुलाकात | अभिषेक शर्मा

थिएटर में काम करना और फिल्मों में काम करना इन दोनों में कितना बड़ा अंतर है लोग आमतौर पर इस बात को नहीं समझ पाते हैं इस एक्टर के नजरिए से जो फर्क है वह आप ही बता सकते हैं

अभिषेक शर्मा : जब मैंने फिल्मों में काम किया तो समझ में आया कि फिल्मी एक्टिंग थिएटर से कम मुश्किल नहीं है। जाहिर सी बात है कि थिएटर में कोई रिटेक नहीं होता है लेकिन आप थिएटर में उस डेढ़ दो घंटे के नाटक को लगातार जीते हैं पर फिल्म में आप को हर बार वहीँ से शुरू करना होता है जहाँ आपने पिछले शॉट में छोड़ा था। थियेटर में कभी भी दो-तीन बार एक ही चीज नहीं हो पाती है कुछ ना कुछ अलग हो ही जाता है लेकिन फिल्म में ऐसा नहीं चलता तो इस मामले में मुझे लगता है कि फिल्म में एक्टिंग कठिन होती है और डबिंग का पार्ट भी बड़ा कठिन काम है। लोगों की ये भी शिकायत रहती है की थिएटर एक्टर बहुत लाउड होते है क्योंकि रंगमंच लाउड मीडियम है अगर हम लाउड नहीं होंगे तो हमारा संवाद हमारा इमोशन ऑडियंस तक नहीं पहुंचेगा। फिल्म में एक्टर को वो किरदार होना पड़ता है जबकि नाटक में उसको संप्रेषित करना होता है।

“ललका गुलाब” से जुड़े अपने अनुभव बताएं।

ललका गुलाब मैं सबसे महत्वपूर्ण किरदार दादी का था और निर्देशक का कहना था कि हम बहुत लॉन्ग शॉट में दादी को दिखाएंगे और कहीं उनका चेहरा रिवेल नहीं होगा तो मैंने पहले शायद उनके सामने रखी थी कि मुझे दादी से आपको मिलवाना पड़ेगा ताकि उनको ध्यान में रखकर मैं पूरी फिल्म जी सकूं। इसके लिए पूनम सिंह जी का चयन हुआ था। उनका बस 2 घंटे का काम था लेकिन उन्होंने मेरे लिए पूरे दो-तीन दिन का समय दिया। हम लोग वहां पर शूटिंग में साथ रहे हैं और एक केमेस्ट्री डेवलप हुई थी। संवाद बोलते समय मैंने कोशिश की कि वह मेरी आंखों में दिखे। बिना दादी के उन को महसूस करना यह एक चैलेंज था, पता नहीं मैं कितना सफल हो पाया यह तो दर्शक के बता पाएंगे।

वास्तविक जिंदगी और ललका गुलाब में कोई समानता है ?

मैं भी अपने दादाजी को बहुत प्यार करता था मैं दादा जी और दादी के साथ बहुत दिनों तक रहा हूँ। निकटता की दृष्टि से वह दादा पोता वाला रिश्ता मुझे बहुत अपना सा लगा क्योंकि मुझे भी अपने दादा जी की याद आती थी।

अभी तक आपके पूरे फिल्मोग्राफी में आपको अपना सबसे फेवरेट रोल कौन सा लगता है जिसे बार-बार आप जीने लगते हैं?

अभिषेक शर्मा जी: मुझे “नया पता” में निभाया अपना किरदार सबसे ज्यादा पसंद है। चूँकि मैं भी दिल्ली में रह चुका हूँ और वो जीवन जी चूका हूँ, मैं उस किरदार को खुद से जुड़ा पाता हूँ। उस किरदार की जो नयी शुरुआत करने की जिजीविषा है वो मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। हालांकि उस फिल्म का और प्रदर्शन होना चाहिए था। वह फिल्म YouTube पर उपलब्ध है आप चाहें तो देख सकते हैं और मुझे लगता है आज नहीं तो कल यह माइग्रेशन का मुद्दा बहुत व्यापक होने वाला है।

आपका अगला नाटक कौन सा है और कौन सी फिल्म है?

अभिषेक शर्मा: मेरा अगला नाटक “कर्फ्यू” मैं खुद डायरेक्ट कर रहा हूं जो डॉ लक्ष्मीनारायण लाल का लिखा हुआ है। यह समाज में जो हमारे आपसी संबंध होते हैं हम अपने ऊपर कर्फ्यू लगा कर जीते हैं उसपर आधारित हैं। यह एक बहुत ही संजीदा प्रेजेंटेशन है इसकी रिहर्सल ६ महीने तक चलने वाली है। अगली फिल्म अनिल शर्मा जी की फिल्म “जीनियस” है जो बॉलीवुड की फिल्म है।

मेरा आखरी सवाल ये है आपकी भाषा ना भोजपुरी है ना मैथिली है सिर्फ हिंदी है, लेकिन आपने उगना ए मोर कतह गेलाह” में मैथिली में और बाकी फिल्मों भोजपुरी में सारे डायलॉग दिए हैं यह आपने कैसे सीखा ?

अभिषेक शर्मा: चूँकि मेरी पैदाइश प्रवेश बिहार की है तो भाषाओं का थोड़ा बहुत ज्ञान है। मैं थोड़ी जल्दी भाषा सीख जाता हूं मैं गुजराती भी बहुत अच्छे से बोल सकता हूं क्योंकि मैंने आर्किटेक्चर की पढ़ाई वहां से की है। और भोजपुरी से तो मेरा खास लगाव रहा है।

आखरी सवाल से एक और बात दिमाग में आ गयी , आप कविता भी लिखते हैं यह बहुत कम लोगों को पता है मैं चाहूंगी कि आपकी कविता का कुछ पंक्तियाँ हो जायें।

अभिषेक शर्मा :

चलो मिल कर एक नया क्षितिज बनाएं,

चलो मिल कर एक नया क्षितिज बनाएं,

क्षितिज पर आकाश आकाश नहीं रह जाता ,

धरती धरती नहीं।

दोनों कितनी सरलता से एक सरल रेखा पर मिल जाते हैं।

ठीक उसी तरह थोडा तुम झुको,

थोडा मैं ।

फिर दोनों मिल कर हम हो जायें,

चलो दोनों मिल कर एक नया क्षितिज बनाएं.

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