Current Affairs Update 28th August by Neeraj Adig.

ओडिशा राज्य विधानमंडल द्वारा विधानपरिषद के गठन संबंधी प्रस्ताव को मंज़ूरी

अगस्त 28, 2018

यदि राज्यों को विधानपरिषदों के गठन से कोई वास्तविक लाभ होता है तो देश के सभी राज्यों को तर्कसंगत रूप से दूसरे सदन/उच्च सदन को अपना लेना चाहिये। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में केवल सात राज्यों में विधान परिषदें हैं और यह तथ्य इस ओर इशारा करता है कि देश में अभी इस मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक सर्वसम्मति की अनुपस्थिति है। चर्चा का मुद्दा यह है कि अब ओडिशा राज्य भी उन राज्यों के समूह में शामिल होना चाहता है, जिनमें उच्च सदन है। इस संदर्भ में राज्य मंत्रिमंडल ने अन्य राज्यों में कार्यरत दूसरे सदन के कामकाज का अध्ययन करने और संबंधित सिफारिशें करने के लिये वर्ष 2015 में स्थापित समिति की रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए 49 सदस्यीय विधानपरिषद को मंज़ूरी भी दे दी है। अब प्रश्न यह है कि विधानपरिषद क्या है और इसके गठन हेतु कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जाती है तथा क्या राज्य को विधानपरिषद से कोई वास्तिवक लाभ होता है अथवा नहीं?
विधानपरिषद

★ संवैधानिक प्रावधान

विधानपरिषद के राज्य विधानमंडल का एक स्थायी और उच्च सदन होता है। इसका विघटन नहीं होता किंतु राज्य इसे बना या समाप्त कर सकता है।
वर्तमान में केवल सात राज्यों – आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर तथा कर्नाटक में विधानपरिषदें हैं।
संविधान के अनुच्छेद 169 के अंतर्गत विधानपरिषद के निर्माण तथा उत्सादन/समाप्ति की प्रक्रिया निम्न प्रकार से है-
किसी भी राज्य में विधानपरिषद के गठन के लिये विधानसभा के (2/3) विशेष बहुमत द्वारा विधानपरिषद के गठन तथा उत्सादन का संकल्प पारित कर संसद के पास भेजा जाता है।
विधानपरिषद के निर्माण व समाप्ति की अंतिम शक्ति संसद के पास है तथा ऐसा संविधान संशोधन किये बिना साधारण प्रक्रिया द्वारा किया जा सकता है।
अनुच्छेद 169 के अंतर्गत यह प्रावधान है कि प्रत्येक राज्य अपनी इच्छा अनुसार चाहे दूसरा सदन रखे या ना रखे।
इस उपबंध का लाभ उठाते हुए आंध्र प्रदेश ने वर्ष 1957 में विधानपरिषद का गठन किया व वर्ष 1985 में इसे समाप्त कर दिया था परंतु वर्ष 2007 से आंध्र प्रदेश में विधानपरिषद अस्तित्त्व में है।

★ विधानपरिषद के गठन की प्रक्रिया

किसी राज्य में उच्च सदन के निर्माण हेतु एक जटिल प्रक्रिया को अपनाया जाता है, जिसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 171 में किया गया है।
अनुच्छेद 171 के अनुसार किसी राज्य की विधानपरिषद में सदस्यों की अधिकतम संख्या विधानसभा के कुल सदस्यों की (1/3) एक तिहाई व न्यूनतम संख्या 40 होनी चाहिये। हालाँकि, अपवादस्वरूप जम्मू-कश्मीर में विधानपरिषद के सदस्यों की संख्या 36 है।
संविधान के अनुच्छेद 171(3) में निर्दिष्ट रीति के अनुसार विधानपरिषद के सदस्यों का निर्धारण इस प्रकार होता है-
1/3 सदस्य राज्य के स्थानीय संस्थाओं, नगरपालिकाओं, ज़िला बोर्ड आदि के सदस्यों से मिलकर बने निर्वाचक मंडल द्वारा चुने जाते हैं।
1/3 सदस्यों का चुनाव विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है।
1/12 सदस्यों का निर्वाचन उन छात्रों द्वारा किया जाता है जो कम-से-कम 3 वर्ष पूर्व स्नातक कर चुके हों।
1/12 सदस्य उन अध्यापकों द्वारा निर्वाचित किये जाते है, जो 3 वर्ष से उच्च माध्यमिक विद्यालय या उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन कर रहे हों।
1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत होंगे, जो कि राज्य के साहित्य, कला, सहकारिता, विज्ञान और समाज सेवा का विशेष ज्ञान अथवा व्यावहारिक अनुभव रखते हों।

★ द्विसदनीय विधायिका का महत्त्व और कमियाँ

उच्च सदन को इस बात के लिये अतिरिक्त सावधानी मानी जा सकती है कि निम्न सदन में बहुमत प्राप्त दल शक्ति का दुरुपयोग न कर सके।
उच्च सदन शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों को एक मंच प्रदान करता है, जो तर्कसंगत रूप से चुनावी राजनीति के झुकाव राज्य को बचाता है, काग़ज पर ही सही, यह एक उचित और उपयोगी कानून के मूल्यांकन हेतु एक तंत्र प्रदान करता है, जिसे एक राज्य पारित कर सकता है।
राज्य स्तर पर विविध हितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिये द्विसदनीय व्यवस्था ज्यादा अनुकूल होती है।
आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि यह सदन सरकार को बना और गिरा नहीं सकता, इसलिये इसकी ज़रूरत नहीं है, लेकिन कई ऐसे काम हैं, जिनकी समीक्षा करने का कार्य यह सदन बहुत सार्थक तरीके से पूरा करता है।
यह लोकतांत्रिक सरकार में नियंत्रण और संतुलन हेतु भी आवश्यक होता है।
हालाँकि, उच्च सदन के विरूद्ध विभिन्न आक्षेपों की भी कमी नहीं है इस संदर्भ में सबसे बड़ा आक्षेप यह है कि इस सदन में बौद्धिकों को शामिल करने का उदार उद्देश्य, फोरम का इस्तेमाल उन पार्टी कार्यकर्त्ताओं को समायोजित करने के लिये किया जा सकता है जो निम्न सदन में निर्वाचित होने में नाकाम रहे हैं।
एक और मुद्दा यह है कि अब भारत के किसी भी राज्य में स्नातक वर्ग नस्ल श्रेणी नहीं है दरअसल, शिक्षा का यह मानक शैक्षिक मानकों को डुबोने जैसा है।
इसके अलावा स्नातक की डिग्री के लिये वास्तविक बौद्धिक चोरी की कोई गारंटी नहीं है। दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि लोकतंत्र में स्नातकों के एक वर्ग को इतनी सुविधाएँ क्यों दी जानी चाहिये?
आज ज्यादातर राजनीतिक दलों में डॉक्टरों, शिक्षकों और अन्य पेशेवरों की पर्याप्त संख्या है।
राज्य सभा का मामला अलग है, क्योंकि यह निर्वाचन क्षेत्रों की बजाय राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है।

★ आगे की राहः

वर्तमान समय की मांग है कि संसद की सदस्यता को निर्धारित करने वाले नियमों का पुनः अवलोकन हो। जय प्रकाश नारायण दलविहीन राज्यसभा के पक्ष में थे। धनबल के दुरुपयोग से निपटने और चुनावों में भ्रष्टाचार रोकने के लिये चुनाव प्राधिकारियों द्वारा सख्त निगरानी की जानी रखना आवश्यक है। विधानपरिषद के सृजन, पुनरुद्धार और उत्सादन के विषय में विविध और असंगत चर्चाएँ निहित हैं। यह सब देखते हुए ओडिशा के प्रस्ताव से देश को बड़े पैमाने पर विधानपरिषदों के निर्माण पर राष्ट्रीय सहमति बनाने का अवसर मिल सकता है।

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